Chaos in bhopal memorial hospital

10.08.2022
गैस पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार की ओर से स्थापित किए गए भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) में गैस पीड़ित मरीजों को दवाइयां ही नहीं मिल रही हैं। जिन मरीजों का डायलिसिस किया जाता है उनको भी जरूरी इंजेक्शन नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में मरीज बाजार से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। कई मरीज आर्थिक तंगी के कारण दवाएं नहीं खरीद पा रहे हैं, ऐसे में उनका इलाज ही नहीं हो पा रहा है।आलम यह है कि यहां हररोज 15 से 20 मरीजों के डायलिसिस किए जाते हैं। लेकिन, डायलिसिस के बाद लगने वाले जरूरी इंजेक्शन और दवा ही नहीं मिल पाती है। भोपाल ग्रुप फोर इंफोर्मेशन एंड एक्शन संस्था की रचना ढींगरा ने इस संबंध में अस्पताल प्रबंधन और निगरानी समिति के साथ ही इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के जिम्मेदारों को अवगत भी कराया है, लेकिन मरीजों को कोई राहत नहीं मिली है।

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Investigation service stopped in pmch

05.08.2022

पीएमसीएच को विश्वस्तरीय बनाया जा रहा है। एक छत के नीचे अंतरराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो रही है। लेकिन, ये भविष्य की बात है। फिलहाल हालत यह है कि राज्य के इस सबसे बड़े अस्पताल के क्लिनिकल पैथोलॉजी विभाग में करीब एक साल से एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी की जांच बंद है। जांच बंद होने का कारण किट खत्म होना बताया जा रहा है।इसकी लिखित जानकारी देने के बावजूद अबतक इन तीनों जांच के लिए किट उपलब्ध नहीं कराई गई है। क्लिनिकल पैथोलॉजी विभाग की ओपीडी में प्रतिदिन 250 से 275, जबकि सेंट्रल इमरजेंसी में 250 से 300 मरीज जांच कराने आते हैं। यानी प्रतिदिन 500 से अधिक मरीजाें की जांच की जरूरत होती है। चिकित्सकों की मानें तो इनमें 100 से अधिक मरीज एचआईवी और हेपेटाइटिस की जांच कराने वाले हाेते हैं। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. आईएस ठाकुर ने बताया कि किट के लिए बीएमएसआईसीएल को लिखा जा चुका है। दवा या किट बीएमएसआईएल ही उपलब्ध कराता है। वहां से नहीं मिलने पर सोचा जाएगा। बगैर टेंडर किए लोकल परचेज नहीं कर सकते हैं।

प्राइवेट में लग रहे ~400
फिलहाल जांच कराने के लिए प्राइवेट में गरीब मरीजों को पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। चिकित्सकों के मुताबिक इन तीनों जांच (पैकेज) के लिए मरीजाें को करीब 400 रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

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New revolution in health sector

04.08.2022
मामूली सर्दी-जुकाम में भी लोग अब विशेषज्ञ डॉक्टर से ही इलाज कराना चाहते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने हर साल दोगुने विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। इसके लिए देश में एमबीबीएस सीटों को तो ज्यादा नहीं बढ़ाया जाएगा, लेकिन पीजी की सीटों को दोगुना कर एमबीबीएस सीटों के बराबर कर दिया जाएगा।अभी देश के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की कुल सीटें 91,927 हैं, जिन्हें 1.10 लाख करने का लक्ष्य है। इतनी ही सीटें पीजी की होंगी, जो अभी 55 हजार हैं। लेकिन, मनपसंद विषय नहीं मिलने की वजह से 50 हजार सीटें भी नहीं भर पातीं। लेकिन, अब पीजी सीटें बढ़ने के बाद एमबीबीएस पास करने के बाद हर डॉक्टर के पास पीजी करने का मौका होगा। नीति आयोग, स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन और वित्त मंत्रालय ने इस योजना का खाका बनाना शुरू कर दिया है।

निजी अस्पतालों में भी बनेंगे विशेषज्ञ
केंद्र सरकार का अनुमान है कि अगर पीजी सीटें बढ़ाकर दोगुनी कर दी जाती हैं तो अगले 5-7 साल में देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर हो जाएगी। इसके लिए सरकारी अस्पतालों में तो पीजी सीटें बढ़ाई ही जाएंगी, साथ में बड़े निजी अस्पतालों में डीएनबी कोर्स के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टर्स तैयार किए जाएंगे। अभी भी देश में 12 हजार डीएनबी सीटें हैं।यहां से विशेषज्ञ बनने वाले डॉक्टरों को निजी अस्पतालों में स्टायपेंड नहीं दिया जाता है या कम दिया जाता है। इस वजह से सीटें नहीं बढ़ पा रही हैं। अब सरकार इसे लेकर नीतिगत निर्णय ले सकती है। सूत्र बता रहे हैं कि निजी अस्पतालों से डीएनबी कोर्स करने वाले डॉक्टरों के लिए सरकार ही स्टायपेंड देना शुरू करेगी। यह राशि अस्पतालों को उनके यहां भरी गईं पीजी सीटों के आधार पर मिलेगी। इस तरह डीएनबी सीटों को बढ़ाकर 25 हजार करने की तैयारी है।

100 से ज्यादा बेड वाले अस्पतालों में डीएनबी कोर्स कराए जा सकेंगे
पीजी कोर्स कराने के लिए निजी अस्पतालों के अलावा ईएसआईसी, आर्मी और पीएसयू के अस्पतालों को भी शामिल किया जाएगा। 100 से ज्यादा बेड वाले अस्पताल में डीएनबी कोर्स की अनुमति दी जाएगी। इसमें 2 साल का डिप्लोमा और 3 साल का डीएनबी कोर्स शामिल होगा। डिप्लोमा करने वाले डॉक्टर नॉन टीचिंग रहेंगे, जबकि डीएनबी वाले टीचिंग कैडर में शामिल किए जाएंगे।

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Instruction to smooth running of facility

प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में पैथोलॉजी से जुड़ी जांचें सुचारु रखने के निर्देश दिए गए हैं। सभी चिकित्सा अधीक्षकों से कहा गया है कि एक माह का अतिरिक्त रिजेंट की व्यवस्था की जाए, जिससे मरीजों को जांच के लिए परेशान न होना पड़ा।कई जिला व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पैथोलॉजी टेस्ट के लिए प्रयोग होने वाले रिजेंट (केमिकल) की कमी हो गई है। ऐसे में जरूरी जांचें नहीं हो रही हैं। इसकी जानकारी मिलने पर c उन्होंने सभी चिकित्सा अधीक्षकों से जांच की स्थिति से संबंधित रिपोर्ट मांगी है। यह भी पूछा है कि कौन-कौन सी जांचें अभी तक शुरू नहीं हो पाई है।

इस तरह की आ रही हैं दिक्कतें
गोंडा जिला अस्पताल में थायरॉयड की जांच नहीं हो रही है। यहां जांच मशीन (कैलिबेटर) में लगने वाला कंट्रोल नहीं है। सीएमएस डॉ. इंदुबाला ने बताया कि कंट्रोल उपलब्ध कराने के लिए इंडेंट भेजा गया है। इसी तरह फर्रुखाबाद के डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय में रिजेंट खत्म होने की वजह से जांचें प्रभावित हो रही हैं। किडनी व लिवर से जुड़ी जांच महिला अस्पताल से कराई जा रही है। इसी तरह प्रदेश के अन्य अस्पतालों में कुछ न कुछ समस्या बनी हुई है।

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Standard of health department

सदर अस्पताल समेत मुजफ्फरपुर जिले का एक भी सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य विभाग के स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है। यहां तक कायाकल्प योजना के तहत अनुशंसित मुरौल सीएचसी भी। जबकि, राज्यस्तरीय एसेसमेंट(मूल्यांकन) के लिए मुरौल सीएचसी को तैयार करने को लेकर बिल्डिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि पर लाखों रुपए खर्च किए गए। लेकिन, मुरौल सीएसची समेत जिले के किसी भी सीएचसी-पीएचसी में 24 घंटे जांच, ब्लड स्टोरेज यूनिट, बीपी जांच के लिए ऑपरेटर, वजन मशीन, प्राइवेसी, कॉर्डिएक मॉनिटर की सुविधा नहीं है।
शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सदर में भी 24 घंटे जांच की सुविधा नहीं है। पिछले वर्ष कायाकल्प योजना के तहत जिले से सदर अस्पताल के एमसीएच के एसेसमेंट की अनुशंसा की गई थी। लेकिन, सरकार की सूची से यह बाहर हाे गया। इस वर्ष मुराैल सीएचसी को कायाकल्प प्रमाणीकरण के लिए तैयार किया गया। इसके बाद सिविल सर्जन ने 12 मार्च काे राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी काे पत्र लिखकर कायाकल्प के तहत अस्पताल के एसेसमेंट की अनुशंसा की।वहीं, 27 मई काे डीएम प्रणव कुमार ने राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक काे पत्र लिखकर मुराैल पीएचसी का कायाकल्प याेजना के लिए एसेसमेंट कराने की अनुशंसा की। डीएम ने लिखा था कि तीन माह तक मुराैल पीएचसी काे मानक में लाने के लिए तैयार किया गया है। बावजूद इसके 26 जुलाई काे जब राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से कायाकल्प के तहत एसेंसमेंट कराने के लिए कार्यपालक निदेशक संजय कुमार सिंह ने जो सूची जारी की, उसमें मुजफ्फरपुर जिले का एक भी अस्पताल शामिल नहीं है।

इस बोर्ड के झांसे में न आएं : सिर्फ दिखावे के लिए हैं, सुविधाएं मयस्सर नहीं

केंद्रीय स्वास्थ्य कल्याण एवं परिवार मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में साफ-सफाई और संक्रमण रोकने के लिए किए गए प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए कायाकल्प योजना की शुरुआत की है। इसके तहत स्वच्छता, साफ-सफाई और संक्रमण नियंत्रण के उच्च मानकों को हासिल करने वाले जिला अस्पतालों, अनुमंडलीय अस्पतालों, सीएचसी, पीएचसी और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को उनके कार्यों के आधार पर पुरस्कार दिया जाता है। स्वास्थ्य सचिव या मिशन डायरेक्टर स्तर की कमेटी अस्पताल में सुविधाओं का एसेसमेंट करती है। प्रथम स्थान अस्पताल को 50 लाख का पुरस्कार दिया जाता है।
कायाकल्प याेजना के लिए सदर अस्पताल के एमसीएच और मुराैल सीएचसी काे तैयार किया गया है। इसके लिए तत्कालीन सिविल सर्जन और फिर डीएम की ओर से राज्यस्तरीय एसेसमेंट कराने के लिए अनुशंसा की गई थी। सरकार की जाे लिस्ट नहीं है, उसे अभी तक देखा नहीं है। अब फिर से दाेनाें अस्पतालाें में जाे भी मानक में कमियां हाेंगी, उसे पूरा कर एसेसमेंट के लिए अनुशंसा की जाएगी।
-डाॅ. यूसी शर्मा, सिविल सर्जन।

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Compulsion of government service reduced in medical colleges in raj.

27.06.2022
प्रदेश के मेडिकल काॅलेजों से पीजी व सुपरस्पेशिलिटी काेर्स के बाद पांच साल की सरकारी सेवा की बाध्यता घटाकर दाे साल कर दी गई है। अगले दाे माह में नीट पीजी की काउंसलिंग हाेनी है, ऐसे में स्टूडेंट्स काे मेडिकल काॅलेज के चयन में इसका लाभ मिलेगा।
इससे प्रदेश के कई स्टूडेंट्स दूसरे प्रदेशाें से पीजी कर रहे थे।
दूसरे प्रदेशाें के कम स्टूडेंट्स ही राजस्थान के कॉलेज चुनते थे। अब अनिवार्य राजकीय सेवा की अवधि 2 साल होने से राजस्थान में प्रवेश के लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी क्याेंकि प्रदेश के स्टूडेंट्स यहां रुकेंगे। हालांकि करार सिर्फ 2 साल का हाेने पर सरकारी अस्पतालाें में डाॅक्टराें की कमी हाे सकती है। राजस्थान में पीजी की करीब 1300 सीटें हैं। नए नियम के बाद नीट-पीजी में होड़ बढ़ेगी लेकिन डाॅक्टर मिलने की उम्मीद कम ही है।

सवाल: क्या डॉक्टर सेवा जारी रखेंगे?
एमबीबीएस में 4 साल के बाद 3 साल पीजी करने में लगते हैं। सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में 3-5 साल और लगते हैं। ऐसे में कई मेडिकाॅज सरकारी सेवा पूरी करने की बजाय निजी क्षेत्र में जा रहे थे। अब वे दाे साल बाद इसे जारी रखेंगे, इसमें संशय है।सरकारी सेवा अवधि 2 साल करने का आदेश।

प्रतिस्पर्धा: सितंबर में काउंसलिंग, स्टूडेंट्स ज्यादा होंगे
असम में 10 साल की राजकीय सेवा अनिवार्य है। राजस्थान व आंध्र में 5 साल व बिहार, झारखंड, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल में 3 साल है। पहले इन राज्यों के स्टूडेंट्स राजस्थान कम आ रहे थे। उलटे राजस्थान से पीजी के लिए बाहर जा रहे थे। अब राजस्थानी छात्र यहीं रुकेंगे, दूसरे प्रदेशाें से स्टूडेंट राजस्थान आएंगे। ऐसे में इस बार सितंबर में हाेने वाली नीट पीजी की काउंसलिंग में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी।

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AIIMS,patna success rate in the treatment of corona is better.

25.07.2022
पटना एम्स के चिकित्सकों ने कोरोना की पहली लहर में भर्ती मरीजों और इलाज के तरीके को लेकर रिसर्च किया है। रिसर्च में यह सामने आया है कि पटना एम्स ने कोरोना मरीजों के इलाज के लिए जो एसओपी तैयार किया था, वह अमेरिका और इटली जैसे विकसित देशों के प्रमुख अस्पतालों के बराबर था। इसका सुखद परिणाम यह रहा कि हमारे डाॅक्टर ज्यादतर कोरोना मरीजों को स्वस्थ करने में सफल रहे।पहली लहर में इलाज के लिए पटना एम्स में 4102 संक्रमित भर्ती हुए थे। इसमें 3268 ठीक हुए। यानी, 79.66 फीसदी। दूसरी ओर, अमेरिका में हुए रिसर्च में खुलासा हुआ है कि न्यूयाॅर्क के प्रमुख अस्पतालों में पहली लहर में भर्ती 5700 मरीजों में 21% की अस्पताल में मौत हई। पटना एम्स का रिसर्च ब्रिटिश मेडिकल जर्नल और अमेरिका में हुआ रिसर्च जामा में प्रकाशित हुआ है।
आठ से 14 दिन में ठीक होकर घर जा रहे थे संक्रमितपटना एम्स में मरीजों के स्वस्थ होने में औसतन 08 से 14 दिन का समय लग रहा था। भर्ती होने के आठवें दिन मरीज की मौत हो रही थी। एक बड़ा खुलासा हुआ कि गंभीर मरीज जिनको रेमडेसीविर लगा उनमें 5.4, प्लाज्मा थेरेपी लेने वालों में 7.76% या फिर टोसलीमुजैब लेने वालों की 6.3 गुना मौतें अधिक हुईं। मृतकों में अिधकतर बीपी और किडनी के मरीज थे।

60+ की अधिक मौतें हुईं
पटना एम्स में मरीज का एवरेज उम्र 55 साल थी। अधिकांश मरीज 51 साल से 60 साल के थे। सबसे अधिक 263 मौत 61 साल से 70 साल की उम्र के मरीजों की हुई। यानी 23 फीसदी 60 साल से अधिक उम्र के मरीजों की मौत हुई। पुरुषों के मुकाबले महिलाएं इस दौरान कम संक्रमित हुई। इनका रेसियो 2.7:1 था।
एम्स ने शानदार काम किया
पटना एम्स की रिसर्च टीम में शिशु रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. लोकेश तिवारी, मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. सीएम सिंह, पूर्व निदेशक डॉ. पीके सिंह के अलावा विभिन्न विभागों के विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल थे। इस बाबत एम्स के निदेशक डॉ. जीके पाल ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान पटना एम्स ने शानदार काम किया।

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Doctors transfer

21.07.2022
चिकित्सा विभाग में बुधवार को जारी तबादला सूची में एमजी अस्पताल के पीएमओ डॉ. रवि उपाध्याय को धरियावद सीएचसी में रिक्त पद पर भेजा है। अब उनके स्थान पर मेडिकल ज्यूरिस्ट डॉ. खुशपाल सिंह राठौड़ को पीएमओ बनाया है। डॉ. खुशपाल अब तक के सबसे युवा पीएमओ हैं। डॉ. राहुल डिंडोर को पीएचसी सालिया से बीसीएमओ परतापुर और डॉ. दीपिका रोत को बीसीएमओ परतापुर से सीएचसी बागीदौरा स्थानांतरण किया है।

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Cheating in the name of duty in raipur

18.07.2022
हैलो- मैं अभिषेक बोल रहा हूं। एनएचएम रायपुर से वैक्सीनेशन के लिए वैकेंसी निकली है। इसके लिए जो भी नर्सिंग स्टॉफ ज्वाइन करना चाह रहे हैं, उसके लिए 40 हजार रुपए डोनेशन लिया जा रहा है। यह डेढ़ साल के लिए एक्सटेंडेड रहेगा और बाद में इसे आगे भी बढ़ा दिया जाएगा। बुधवार तक इसकी लिस्ट जारी हो जाएगी। इसके बाद जिला अस्पताल पंडरी, मेकाहारा या डीकेएस हॉस्पीटल में टीकाकरण के लिए ड्यूटी दे दी जाएगी।’ यह ऑडियो ’पत्रिका’ को एक युवक से प्राप्त हुई है। इसमें अभिषेक नामक का एक युवक 40 हजार रुपए डोनेशन लेकर एनएचएम में वैक्सीनेशन के लिए नौकरी लगाने की बात कह रहा है, जबकि नेशनल हेल्थ मिशन रायपुर में इस तरह की कोई वैकेंसी ही नहीं निकली है। रायपुर स्वास्थ्य विभाग के डीपीएम मनीष मेजरवार ने बताया, कोई भर्ती नहीं निकली है। वैक्सीनेशन के लिए भर्ती होती ही नहीं है। कान्ट्रेक्ट बेस पर इसमें कार्य लिया जाता है।

मध्यप्रदेश में भी छह को लगाई नौकरी!

नौकरी लगाने का दावा करने वाले व्यक्ति के मोबाइल नंबर को ट्रूकॉलर में सर्च करने पर ’अभिषेक एम्स’ नाम दिखाई पड़ रहा है। ऑडियो में 40 हजार रुपए डोनेशन लेकर डेढ़ साल तक या इसके आगे भी नौकरी लगे रहने का दावा किया जा रहा है। इसके लिए ऑनलाइन पेमेंट करने की बात कही जा रही है। जब फोन करने वाले व्यक्ति ने कन्फर्मेशन की बात कही तो उक्त व्यक्ति कन्फर्मेशन नहीं मिलने पर दूसरे दिन रुपए वापस करने की बात कह रहा है। ऑडियो में नौकरी लगाने का दावा करने वाले व्यक्ति ने मध्यप्रदेश में भी छह लोगों को स्कूल, हेल्थ विभाग में नौकरी लगाने का दावा कर रहा है।

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Fake payment in the name of public health in Banswara

18.07.2022
बांसवाड़ा जिले में चल रही मोबाइल मेडिकल वैन के कैंपों में बड़े स्तर पर लापरवाही और अनियमितता बरती जा रही है। जिसका फायदा उठाकर चिकित्सा विभाग और वैन संचालित करने वाली फर्म द्वारा फर्जीवाड़ा किया जा रहा है। इसी फर्जीवाड़े में हर महीने लाखाें रुपए के बिल का भुगतान हाे रहा है। जबकि माैके पर चिकित्सा कैंप सभी सुविधाएं मरीजों काे नहीं मिल रही हैं। सुविधाएं ताे दूर यहां कैंपों में डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हाे रहे। जांच के लिए नर्सिंग स्टाफ और लैब टेक्नीशियन तक नहीं हैं। इसके बाद भी ब्लॉकस्तर पर बीसीएमओ द्वारा फर्जी वेरीफिकेशन कर वैन संचालित करने वाली फर्म काे हर महीने 15 से 16 लाख रुपए तक का भुगतान किया जा रहा है। वहीं दवाओं का 1 से 1.10 लाख रुपए तक का अतिरिक्त भुगतान हाे रहा है। इसमें विभाग स्तर पर भी कमीशन लेने की आशंका है।कारण यह है ऐसे कैंपों की जानकारी अधिक से अधिक लाेगाें काे मिले, लेकिन चिकित्सा विभाग द्वारा मोबाइल वैन काे लेकर काेई प्रेस रिपोर्ट जारी नहीं की गई। इधर, जब भास्कर टीम ने विभाग से हर ब्लाॅक से मासिक कैंप डिटेल मांगी ताे अफसरों ने इनकार कर दिया। इसके बावजूद भास्कर टीम ने परतापुर और अरथूना ब्लाॅक के कैंप डिटेल निकालकर दाैरा किया ताे कैंप के नाम पर औपचारिकता की जा रही है। जिले में 11 ब्लाॅक में हर महीने अलग-अलग जगहों पर कैंप लगाए जाते हैं। इन कैंपों में जहां कई कैंप में न ताे डॉक्टर हाेते हैं न ताे नर्सिंग स्टाफ, महज 8 से 10 प्रकार की दवाएं वैन में लाकर ओपीडी पर्ची मरीज की बनाकर उन्हें थमा दी जाती है।

अरथूना ब्लॉक में शिविर लगाया, लेकिन कहीं दवाएं ताे कहीं उपकरण कम

7 जुलाई, छाेटी बस्सी अरथूना : अरथूना ब्लाॅक के छाेटी बस्सी में मोबाइल मेडिकल वैन में न काेई डॉक्टर था न ही काेई नर्सिंग स्टाफ। यहां तक की मरीजों की जांच के लिए लैब टेक्नीशियन तक उपलब्ध नहीं थे। दोपहर 12 बजे तक कैंप में सिर्फ 6 मरीजों की ही ओपीडी पर्ची कटी थी। माैके पर ओपीडी रजिस्टर भी नहीं मिला। ड्राइवर सहित अन्य कार्मिक था, उन्होंने बताया कि वैन में सिर्फ 20 तरह की दवाएं ही उपलब्ध हैं। वहीं जांच के लिए पर्याप्त मशीन भी उपलब्ध नहीं थे।

9 जुलाई, हताेड़िया : यहां मोबाइल मेडिकल वैन कैंप स्थल पर निजी फर्म द्वारा लगाए स्टाफ में डॉ. मनाेहर मीणा, एक अन्य स्टाफ और एक ड्राइवर ही थे। माैके पर चिकित्सा विभाग की ओर से एएनएम की उपस्थिति जरूरी हाेती है, लेकिन विभाग का काेई कार्मिक नहीं मिला। यहां ब्लड प्रेशर जांच का मशीन ही खराब पड़ा मिला। मेडिकल स्टॉक रजिस्टर भी नहीं मिला। डॉक्टर से बात कि ताे बताया कि 70 की जगह 40 प्रकार की दवाएं ही उपलब्ध हैं।

11 जुलाई, हड़मतिया : हड़मतियां गांव में पहुंची मोबाइल मेडिकल वैन में एक कार्मिक राजेश खराड़ी मौजूद था। जिसके साथ में एक अन्य व्यक्ति जाे खुद काे डॉक्टर बता रहा था, लेकिन किसी भी स्टाफ के पास पद और डिग्री काे दिखाता काेई अाईडी कार्ड नहीं था। यहां पर भी छाेटी बस्सी की तरह जांच उपकरण ताे कम थे ही, दवाओं की संख्या भी बहुत कम थी। यहां पर 12 बजे तक एक भी मरीज नहीं पहुंचा था। इसके थोड़ी देर बाद मौजूद दोनों कार्मिक भी वहां से चले गए। वह केवल दो डब्बे में ही दवाएं लेकर आए थे।

शिविर लगाने और भुगतान के नियम : मेडिकल मोबाइल वैन की ओर से हर महीने एक ब्लॉक में 20 शिविर का शैड्यूल तैयार किया जाता है। एक दिन पहले उस गांव में शिविर की सूचना दी जाती है। इसकी एवज में सरकारी वैन होने पर 1 लाख 34 हजार 500 रुपए प्रति वाहन मासिक भुगतान का प्रावधान है। अगर गाड़ी कंपनी की है तो 1.49 लाख रुपए प्रति वाहन मासिक भुगतान किया जाता है। इसमें डॉक्टर, लैब टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट व नर्सिंग कर्मी होना जरूरी है। वैन में 70 प्रकार की दवाएं हाेना जरूर हैं।

मई-21 से फरवरी-22 तक भुगतान

माह वाहन भुगतान दवाओं का भुगतान
मई 1038012 105212

जून 1583550 104904

जुलाई 1583550 104567

अगस्त 1450550 105450

सितंबर 1585050 जानकारी नहीं मिली

अक्टूबर 1585050 104273

नवंबर 1585050 105402

दिसंबर 1585050 108306

जनवरी 1585050 109286

फरवरी 1585050 109194

बांसवाड़ा में हमारी सभी वाहनों पर जीपीएस है और हम जाेधपुर से मॉनिटरिंग करते हैं। वहां हर कैंप के फाेटाे हमें मिलते हैं। ऐसे में काेई समस्या नहीं है। फिर भी ऐसी काेई समस्या बता रहे हैं ताे उसमें सुधार करेंगे। डॉक्टर और स्टाफ की मौजूदगी सुनिश्चित करेंगे। -सुरेंद्र भंडारी, मैनेजिंग ट्रस्टी, परमात्माचंद भंडारी चैरिटेबल ट्रस्ट

^कैंप प्लान पूरा ब्लाॅक लेवल से ही तैयार हाेता है। मॉनिटरिंग बीसीएमओ स्तर पर ही की जाती है। जिसकी रिपोर्ट हमें बाद में भेजते हैं। ऐसा है ताे कल ही जांच कराएंगे। – डॉ. एचएल ताबियार, सीएमएचओ

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