Doctors gave a new life to patient

10.08.2022

27 साल की उम्र ही क्या होती है। अगर फैक्ट्री में काम करने वाले वर्कर का हाथ बुरी तरह से कुचल उठे तो सोचिए, वो मंजर कैसा रहा होगा। घटना नवंबर 2019 की है। सुबह के 5 बज रहे थे और यूपी के सहारनपुर के रहने वाले जख्मी युवक को अस्पताल में भर्ती किया जाता है। उसका बायां हाथ (फोरआर्म) हाइड्रोलिक प्रेशिंग मशीन से पूरी तरह से क्रश हो गया था। फोरआर्म का मतलब अग्रभुजा यानी हाथ की कोहनी से आगे का हिस्सा पूरी तरह से जख्मी था। पूरे तीन साल तक कई स्तर की सर्जरी करने वाले एम्स दिल्ली (Aiims Delhi) के डॉक्टरों ने आखिरकार कमाल कर दिया। उस मरीज के लिए यह चमत्कार से कम नहीं है। इसके साथ ही एम्स देश का पहला अस्पताल बन गया, जहां एक मरीज के लिए सफलतापूर्वक नया फोरआर्म ही तैयार कर दिया गया।

बस एक राहत की बात थी
डॉक्टर बताते हैं कि उस दिन जब फैक्ट्री वर्कर अस्पताल आया था तो कोहनी के जोड़ से चोट 5 सेमी दूर तक थी। कलाई की तरफ स्किन, सॉफ्ट टिशूज, नर्व्स, मशल्स और हड्डी चोटिल हुई थी, बाकी हाथ को उतना नुकसान नहीं पहुंचा था। फैक्ट्री में बड़ी-बड़ी मशीनों को हैंडल करने में हाथ का ही इस्तेमाल होता है और ऐसे में काफी जोखिम होता है। इस केस में डॉक्टरों ने तीन स्टेज में आगे बढ़ने का फैसला किया। राहत की बात यह थी कि युवक की हथेली अब भी सामान्य स्थिति में थी और अपना फंक्शन कर रही थी।

डॉक्टरों ने बनाया प्लान
डॉ. मनीष सिंघल की अगुआई वाली प्लास्टिक सर्जरी की टीम ने मरीज की स्थिति का गंभीरता से आकलन किया। साफ हो चुका था कि यह बहुत ही जटिल केस है। हाथ जख्मी नहीं है और आगे के हिस्से यानी फोरआर्म में काफी चोट है जिससे अलग तरह की समस्या पैदा हो जाती है और ऐसे केस में हाथ का रीअटैचमेंट संभव नहीं होगा क्योंकि आगे का हाथ तो बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था।

6 घंटे का टाइम कीमती होता है
प्लास्टिक, पुनर्निर्माण और बर्न सर्जरी डिपार्टमेंट के प्रमुख सिंघल ने कहा, ‘ऐसे मामलों में सर्जरी तभी संभव हो पाती है जब मरीज को दुर्घटना के 6 घंटे के भीतर अस्पताल लाया गया हो। किस्मत से, इस मरीज को इस समय के भीतर लाया गया था।’इस केस में आमतौर पर दो विकल्प बनते थे, मरीज को प्रोस्थेटिक हाथ दिया जाए या हाथ के क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाकर फंक्शन कर रही हथेली को हाथ से अटैच किया जाए। लेकिन बाद वाले विकल्प में हाथ की लंबाई घट सकती थी। ऐसे में डॉक्टरों की टीम ने फोरआर्म को फिर से बनाने का फैसला किया और उसके साथ हथेली को जोड़ा जाना था।

पहला स्टेप
चोटिल हाथ से हथेली को जल्द से जल्द अलग करना था और क्रश हो चुके हिस्से को अलग। ऐसे में कोहनी की चोट की फिर से सिलाई की गई।

दूसरा स्टेप
अब हथेली को शरीर के दूसरे हिस्से से अटैच करना था। डॉक्टरों ने टखने के करीब बाएं पैर से इसे अटैच कर दिया। देखने और समझने में यह अजीब बात थी लेकिन डॉक्टरों के ऐसा करने के पीछे वजह चिकित्सकीय थी।

प्लास्टिक और बर्न्स सर्जरी विभाग के डॉ. राजा तिवारी ने बताया कि हम हथेली की संवेदनशीलता को बरकरार रखना चाहते थे इसीलिए इसे पैर से जोड़ा गया। अगर इसे शरीर के किसी दूसरे हिस्से से जोड़ा गया होता तो सेंसेशन खत्म हो सकता था। जब हाथ को वापस अपनी जगह लाया गया तो हमने बाएं पैर की उसी नर्व्स को भी लिया था। यही नहीं, हथेली को अस्थायी तरीके से अटैच करने के लिए पैर की हड्डियों का पता लगाना आसान था। डॉ. तिवारी ने कहा कि हमने पैर को चुना क्योंकि उसमें अतिरिक्त नसें, रक्त वाहिकाएं और मांसपेशियां होती हैं।

आगे की चुनौती
अब नया फोरआर्म बनाने के लिए डॉक्टरों ने पैरों से दो टिशू यूनिट निकाला। पहला हिस्सा घुटने के नीचे वाले हिस्से से लिया गया और दूसरा जांघ के पास से निकाला गया। आखिर में पैर में लगाई गई हथेली को अलग कर नए फोरआर्म के आगे जोड़ना था जिससे तंत्रिका तंत्र की मरम्मत या कहिए ऑपरेशन पूरा होता।सर्जरी टीम में शामिल डॉ. शिवांगी साहा ने बताया कि धमनियां, नसें और मांसपेशी को हड्डी से जोड़ने वाले ऊतक होते हैं जो अंगुलियों को मांसपेशियों से कनेक्ट करते हैं। हाथों का मूवमेंट करने के लिहाज से कमांड और कंट्रोल करने में ब्रेन के लिए कोई समस्या नहीं थी। बस इतना जरूर है कि मांसपेशी की ताकत कम हो जाती है।आज की तारीख में मरीज चाबी का इस्तेमाल कर सकता है, कुछ उठा सकता है, पानी की बोतल ले सकता है और कोहनी की ताकत भी अच्छी है। वह अपने बाएं हाथ से बड़ी चीजें भी पकड़ सकता है। वह अपनी अंगुलियों और अंगूठे के बीच में पेन पकड़ सकता है और पास की मांसपेशियों की मदद से लिख सकता है।सिंघल ने बताया कि महामारी के दौरान फॉलोअप कर पाना एक और बड़ी चुनौती रहा। हमने लॉकडाउन के दौरान एक टेली-रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम भी किया। प्लास्टिक सर्जरी डिपार्टमेंट से डॉ. शशांक चौहान और डॉ. सुवशीष दाश और ऑर्थोपेडिक व एनेस्थीशिया विभागों से डॉ. समर्थ मित्तल और डॉ. सुलगना भी टीम में शामिल थे। फिजियोथेरेपी का भी एक बड़ा रोल था जिसे डॉ. मीसा ने लीड किया था।

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Sesonal diseases in rajasthan

10.08.2022
राजस्थान में बारिश के साथ मौसमी बीमारियों का दौर शुरू हो गया है। जयपुर समेत राज्य के सभी हॉस्पिटल की ओपीडी में इन दिनों वायरल फीवर के केस तेजी से बढ़ रहे है। राजस्थान के सबसे बड़े हॉस्पिटल एसएमएस में इन दिनों ओपीडी में मरीजों की संख्या 9 हजार के पार पहुंच गई है। वायरल फीवर, खांसी-बुखार, जुकाम के अलावा डेंगू-मलेरिया के केस भी सामने आ रहे है। मेडिकल हेल्थ डिपार्टमेंट राजस्थान के मुताबिक पिछले एक सप्ताह में पूरे राज्य में 88 केस डेंगू के डिटेक्ट हुए है, जिसमें से 2 मरीजों की मौत हो गई।जयपुर एसएमएस के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर और यूनिट हेड डॉ. पुनीत सक्सेना की माने तो अभी वायरल फीवर, सामान्य बुखार, खांसी-झुकाम के केस बढ़ रहे है। इनमें कई कुछ केस डेंगू-मलेरिया के भी, लेकिन अभी ये बहुत कम है। उन्होंने बताया कि लोगों को भीड़-भाड़ वाले एरिया में मास्क लगाकर जाना चाहिए, जिससे लोग संक्रमित बीमारियों से बचने में तो मदद मिलेगी, कोरोना से भी खुद को बचाया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि जैसे बारिश का दौर धीमा पड़ेगा मच्छर बढ़ेंगे और फिर डेंगू-मलेरिया व चिकनगुनिया के केस भी बढ़ने लगेंगे।

बच्चों में उल्टी-दस्त की शिकायतें आने लगी
मौसम की इस बीमारी से बच्चे भी तेजी से चपेट में आ रहे है। जयपुर के जेके लॉन हॉस्पिटल में अब ओपीडी में भीड़ बढ़ने लगी है। इसमें ज्यादातर मामले सामान्य बुखार और खांसी-जुकाम के अलावा उल्टी-दस्त के भी मरीज है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर और जेके लॉन रेयर डिजीज सेंटर में नियुक्त डॉ. प्रियांशु माथुर की माने तो इन दिनों कुछ बच्चों के हाथ-पैर में दाने की भी शिकायतें देखने को मिल रही है। हालांकि ये सभी अभी सामान्य वायरल वाले ही केस है, इनमें कोई नया वायरल का केस सामने नहीं आया है।

प्रतापगढ़ जिले में दो गुने हुए डेंगू के मरीज
राजस्थान में जिलेवार स्थिति देखे तो प्रतापगढ़ जिले में डेंगू तेजी से बढ़ रहा है। 27 जुलाई तक प्रतापगढ़ में डेंगू के प्रतापगढ़ 25 केस सामने आए थे, जो 5 अगस्त तक बढ़कर 61 हो गए। वहीं अलवर में पिछले एक सप्ताह में 2 डेंगू के केस डिटेक्ट हुए है और दो ही मौत हुई है। प्रतापगढ़, अलवर के अलावा डेंगू प्रभावित जिलाें में कोटा, दौसा, करौली, भरतपुर और जयपुर भी है।

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Ayushman scheme failed in punjab

स्वास्थ्य बीमा योजना, आयुष्मान योजना के लाभार्थियों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है क्योंकि निजी अस्पतालों ने उनके लिए पहले ही अपने दरवाजे बंद कर लिए थे और अब सरकारी अस्पतालों में ‘आरोग्य मित्रों’ ने भी उनकी सहायता करना बंद कर दिया है।आयुष्मान योजना के लाभार्थियों की सहायता के लिए सरकारी अस्पतालों में तैनात 150 ‘आरोग्य मित्र’ ने अपनी सेवाएं देना बंद कर दिया क्योंकि उन्हें पिछले दो महीनों से वेतन नहीं मिला है। वे वहां योजना के लाभार्थियों की मदद करने के लिए थे ताकि उन्हें आसानी से इलाज मिल सके।उनके विरोध के परिणामस्वरूप, आयुष्मान भारत मुख मंत्री सेहत बीमा योजना योजना राज्य भर के सभी सरकारी अस्पतालों में ठप हो गई है। यह योजना कार्ड धारकों को 5 लाख रुपये तक का कैशलेस स्वास्थ्य उपचार सुनिश्चित करती है।अफसोस की बात है कि सरकार द्वारा बकाया राशि की प्रतिपूर्ति करने में विफल रहने के बाद, निजी सूचीबद्ध अस्पतालों ने स्वास्थ्य योजना के पात्र लाभार्थियों के लिए पहले ही अपने दरवाजे बंद कर लिए थे।जून से वेतन नहीं मिलने वाले आरोग्य मित्रों ने मंगलवार से लाभार्थियों के आयुष्मान कार्ड की प्रोसेसिंग बंद कर दी है। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने दावा किया कि आउटसोर्सिंग एजेंसी – एमडी इंडिया – को राज्य स्वास्थ्य एजेंसी से धन नहीं मिला है, जो राज्य में योजना के कार्यान्वयन के लिए नोडल एजेंसी है।आरोग्य मित्रों में से एक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमारे पास हड़ताल पर जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था क्योंकि हम बिना वेतन के हैं। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और एमडी इंडिया को भुगतान करना चाहिए।

इंडोर मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित

योजना के तहत विभिन्न अस्पतालों में भर्ती मरीजों को इलाज के लिए जारी नहीं रख पाने के कारण उन्हें मझधार में छोड़ दिया गया है। साथ ही, जिन रोगियों को छुट्टी की आवश्यकता होती है, वे आगे नहीं बढ़ सकते क्योंकि उन्हें आरोग्य मित्र से मंजूरी की आवश्यकता होती है जिन्होंने काम करना बंद कर दिया है।मानसा की लाभार्थी रोगी चरणजीत कौर के एक परिजन भूपिंदर सिंह ने कहा, “हमारा मरीज गवर्नमेंट राजिंद्र अस्पताल में भर्ती है और बहुत गंभीर है। हमें इलाज करवाना है। हालांकि, आरोग्य मित्र ने कार्ड को प्रोसेस करने से मना कर दिया है। हम महंगे लैब टेस्ट का खर्च नहीं उठा सकते।

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Doctors pray to god before surgery

डॉक्टर भी कठिन परिस्थितियों और मुश्किल वक्त में ईश्वर को याद करते हैं। इसका अंदाजा हाल ही में वायरल इस वीडियो को देखकर लगाया जा सकता है, जिसमें डॉक्टर्स और नर्सेस की टीम को ऑपरेशन से पहले प्रार्थना करते हुए देखा जा रहा है।हमारे देश में डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन धरती के ये भगवान भी उस परमपिता और अदृष्य शक्ति पर भरोसा करते हैं, जो इस संसार को चला रही है।भले ही साइंस कितनी ही आगे निकल जाए, लेकिन कोई भी ‘दैवीय शक्ति’ को नकार नहीं सकता। इसका अंदाजा वायरल हो रहे इस वीडियो को देखकर लगाया जा सकता है।डॉक्टर भी कठिन परिस्थितियों और मुश्किल वक्त में ईश्वर को याद करते हैं। ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें डॉक्टर्स और नर्सेस की टीम को ऑपरेशन से पहले प्रार्थना करते हुए देखा जा सकता है।

VIDEO HERE

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Checks stopped in sms jaipur

08.08.2022
एसएमएस अस्पताल डेढ़ साल से कार्यवाहक अधीक्षक के भरोसे है। अस्थाई अधीक्षक डॉ. विनय मल्होत्रा के पास एसएमएस के साथ-साथ सुपर स्पेशलिटी का भी जिम्मा है। कर्मचारियों की लापरवाही और घोटालों से नाराज डॉ. मल्होत्रा का दर्द छलक उठा। उनका कहना है अधीक्षक पद पर स्थाई नियुक्ति हो तभी बेहतर होगा। लापरवाही और घोटाले स्थाई हैं और मैं अस्थाई। कार्यवाहक सिर्फ, कार्यवाहक ही होता है। सिस्टम स्थाई अधीक्षक ही सुधार सकता है।

2000 तक के एलर्जी टेस्ट और 900 की एनटीसीसीपी समेत 7 जांचें नहीं
अफसर और बाबुओं की मनमानी से 2 महीने पहले आईं 2 जांच मशीनें शुरू नहीं हो सकी हैं। अस्पताल अधीक्षक मशीनों को शुरू करने के लिए 3 बार बोल चुके हैं, लेकिन हालात नहीं सुधरे। मशीनें शुरू नहीं होने के कारण करीब 2000 रुपए तक वाली एलर्जी, 900 रुपए की एनटीसीसीपी समेत 7 तरह की महंगी जांचें बंद हैं। ओपीडी में हर दिन एलर्जी के 100 से अधिक केस आते हैं। इनमें से 40 फीसदी मरीजों की जांचें होती हैं। इन सभी मामलों में उनका कहना है कि मैं कई बार इनसे कह चुका हूं लेकिन सुविधाएं शुरू नहीं हुईं। इस पर सख्ती की जाएगी।

सैटेलाइट-कांवटिया भी कार्यवाहक के भरोसे हैं
एसएमएस अस्पताल के अलावा कांवटिया और सैटेलाइट अस्पताल शास्त्रीनगर भी कई सालों से कार्यवाहक अधीक्षक के भरोसे ही हैं। यही कारण है कि इन अस्पतालों में भी व्यस्थाएं नहीं सुधर पा रही हैं। चिकित्सा विभाग के आला अधिकारी लगातार इन अस्पतालों की अनदेखी कर रहे हैं। इन अस्पतालों में भी मरीजों से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता है।

डॉक्टरों के ट्रांसफर में बिजी अफसर
एसएमएस अस्पताल के प्रमुख पद ही कार्यवाहक के जिम्मे हैं और चिकित्सा विभाग सिर्फ डॉक्टरों के ट्रांसफर में व्यस्त है। इन ट्रांसफर में भी अफसरों ने जमकर गलतियां कीं और सरकार की किरकिरी कराई। मेडिकल कॉलेज में एडिशनल प्रिंसिपल के रिक्त पद को भरने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए।

स्थाई अधीक्षक से ही बेहतर काम
स्थाई पद हो तो काम आसान होता है। आमजन को बेहतर इलाज मिले इसके लिए कोशिशें की जा रही हैं। सुपर स्पेशलिटी सेंटर को भी बेहतर चलाया जाना है और उसकी भी जिम्मेदारी है। – डॉ. विनय मल्होत्रा, कार्यवाहक अधीक्षक, एसएमएस

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Corona infection in Alwar

08.08.2022
जिले में काेराेना संक्रमण तेजी से बढ़ने लगा है। शनिवार काे अकबरपुर सीएचसी का डाॅक्टर और सीआईएसएफ सेंटर अनंतपुरा के जवान सहित 89 नए पाॅजिटिव मिले। 24 घंटे में पिछले 3 महीने में काेराेना पाॅजिटिव मरीजाें की यह सबसे बड़ी संख्या है।चिकित्सा विभाग के अनुसार बहराेड़ ब्लाॅक में सर्वाधिक 29, अलवर शहर व तिजारा में 8-8, मालाखेड़ा, लक्ष्मणगढ़ व रामगढ़ में 7-7, काेटकासिम, भिवाड़ी, राजगढ़ व नीमराना में 4-4, रैणी में 3, खेड़ली में 2, शाहजहांपुर व मुंडावर में 1-1 पाॅजिटिव मिले हैं।जिले में अब एक्टिव केस बढ़कर करीब 225 हाे गए हैं। चिकित्सा विभाग के अनुसार अलवर शहर में पुलिस लाइन, कालाकुआं, जाट काॅलाेनी दाे साै फुट राेड, लाजपत नगर, नाथकी बगीची, मालाखेड़ा में सीरावास, अहमदपुर, पलखड़ी, कालीखाेल, काेटकासिम, भाेजराजका की ढाणी, मकडावा, जमालपुर, बहराेड़, बर्डाेद, अजमेरीपुर, ढिस, कांकरा, नांगल खाेडिया, डूमराेली, गाेलावास, भिटेडा, रामगढ़, सैंथली,मिलकपुर,अकलीमपुर, लक्ष्मणगढ़ में बड़ाैदामेव, दीनार, बसई सैदावत, कफनवाड़ा,हिगाेटा, सैमला खुर्द, तिलवाड़, राजगढ़ में शिंभूबास, राजपुरबड़ा, टहला, खेड़ली में हाजीपुर, मेठाना, रैणी में पाटन, बीलेटा व माेराेदकलां, नीमराना में चाैबारा, सक्तपुरा,शाहजहांपुर में जाैनायचा कलां, मुंडावर में भीखावास, तिजारा ब्लाॅक में काराेली, खिजूरीवास, करनकुंज, नंदरामपुर, निंबाहेडी, शाहबाद, टपूकड़ा व गंधाेला चाैपानकी, भिवाड़ी में भिवाड़ी गांव व मिलकपुर में पाॅजिटिव केस मिले हैं। एक सीकरी भरतपुर और एक काेटपूतली का केस पाॅजिटिव मिला है।

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PPP medical colleges in mp

06.08.2022
चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री विश्वास कैलाश सारंग ने मध्यप्रदेश में पीपीपी मॉडल आधारित चिकित्सा महाविद्यालय शुरू करने समीक्षा बैठक की। समीक्षा में प्रथम चरण में प्रदेश के 5 जिलों में पीपीपी मॉडल आधारित चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना करने का निर्णय लिया। इसमें भोपाल, इंदौर, जबलपुर, बालाघाट एवं कटनी में पीपीपी मॉडल पर मेडिकल कॉलेज शुरू करने का निर्णय लिया।

निजी निवेशकों को भूमि लीज़ पर उपलब्ध करायेगी राज्य सरकार
राज्य सरकार द्वारा मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिये निजी निवेशक को 99 वर्ष (60 वर्ष + 39 वर्ष) की लीज पर भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अतिरिक्त निजी निवेशक को 300 बिस्तरीय अस्पताल भवन भी राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।
EWS मरीजों को मिलेगा निःशुल्क उपचार
पीपीपी मॉडल आधारित अस्पतालों में आयुष्मान मरीजों के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को भी निःशुल्क उपचार मिल सकेगा। वहीं गैर आयुष्मान मरीजों को बाजार दर पर उपचार की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।उल्लेखनीय है कि भारत सरकार की पीपीपी मॉडल पर मेडिकल कॉलेज की स्थापना नीति अनुसार राज्य सरकार के वर्तमान में संचालित मेडिकल कॉलेज को ट्रेनिंग हॉस्पिटल के रूप में परिवर्तित कर 100 एमबीबीएस सीट के प्रवेश के लिये पीपीपी आधारित मेडिकल कॉलेज की स्थापना की जाएगी। बैठक में अपर मुख्य सचिव श्री मोहम्मद सुलेमान, आयुक्त चिकित्सा शिक्षा श्री निशांत वरवड़े सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

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Mind of super doctors is breaking

06.08.2022
इस साल भी मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशिऐलिटी की काफी सीटें नहीं भर पाईं। यह तब है, जब सरकार लगातार मेडिकल कॉलेज खोल रही है, एम्स की संख्या भी बढ़ा दी गई है। लेकिन क्या इन सब में स्वास्थ्य सेवाएं ठीक से उपलब्ध हैं? कागजों पर जो एम्स और मेडिकल कॉलेज बढ़े, वे पारिभाषिक रूप से फंक्शनिंग नहीं हुए। लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है कि सुपर स्पेशिऐलिटी में सीटें नहीं भरीं। एम्स दिल्ली सुपर मॉडल प्रॉजेक्ट है, मगर इसी में ठीक से काम नहीं हो पा रहा है। कैंसर तक के ऑपरेशन में छह महीने बाद की डेट मिलती है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो कई और पहलू उभरते हैं। आइए जरा उन्हें भी देख लें

-दूसरी जगहों के एम्स और मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशलिस्ट काम कर सकते हैं, पर वहां मशीन है तो तकनीशियन नहीं हैं। तकनीशियन हैं तो नर्सिंग स्टाफ नहीं है। दोनों हैं तो ऑपरेशन के लिए ट्रेंड लोग नहीं हैं।
–सुपर स्पेशलिस्ट से बॉन्ड लिखवाया जाता है कि कम से कम तीन साल तो उसे सिर्फ रेफरल जॉब करनी है। मतलब डिग्री लेने के बाद कम से कम तीन साल तक वह अपनी डिग्री का यूज नहीं कर पाएगा, और जो कुछ भी करेगा, वह फ्री में ऐसी जगह पर बैठकर करेगा, जहां उसे कुछ करने की सुविधा ही नहीं है।

–सुपर स्पेशिऐलिटी की सीट छूटने की एक वजह यह भी है कि कार्डियक और प्लास्टिक सर्जरी की ब्रांचेस में सीट काफी हो गई हैं और मेडिकल कॉलेजों में उनकी उतनी सुविधा नहीं है। खासकर प्लास्टिक सर्जरी के लिए।

–स्वास्थ्य व्यवस्था के लचर होने में आरक्षण भी एक वजह है। डिफेंस, डीआरडीओ या साइंस रिसर्च में सरकारें मानती रही हैं कि इन चीजों से समझौता नहीं हो सकता तो क्या लोगों की जान इतनी सस्ती है?

–एमबीबीएस में प्रवेश तक तो आरक्षण का स्वागत है। लेकिन उसके बाद सबको एक सी सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए पोस्ट ग्रैजुएशन और सुपर स्पेशिऐलिटी में आरक्षण नहीं होना चाहिए। एमबीबीएस के बाद ओपन एंट्री सिस्टम हो, ताकि डॉक्टरों का लेवल तो एक हो सके।

–मेडिकल कॉलेज रिसर्च के सबसे बड़े हब हैं। वहां लाखों मरीज आते हैं। अगर वहां सुपर स्पेशलिस्ट के लिए पूरी सुविधा हो तो नई-नई रिसर्च सामने आ सकती हैं। इलाज के नए-नए तरीके खोजे जा सकते हैं, लेकिन उनमें रिसर्च की पूरी सुविधा नहीं है।

एसी कमरों की नीतियां
अगर कोई सुपर स्पेशलिस्ट जॉइन भी कर ले तो पता चलता है कि वहां उससे कम डिग्री पाया हुआ जूनियर ही उसका सीनियर है। वहां भी प्रमोशन में आरक्षण का चक्कर है। ऐसे में डॉक्टर डीमोटिवेट होता है। जो इसे पहले से जानते हैं, वे एडमिशन नहीं लेते। जो किसी तरह से आ भी जाते हैं, उनके सामने दो रास्ते बचते हैं। या तो वे देश में कोई कॉरपोरेट अस्पताल जॉइन करें या देश ही छोड़ दें। जो बाकी बचते हैं, उनकी अगली समस्या काम करने के माहौल की होती है। सरकारी में सुविधा नहीं तो कॉरपोरेट में डॉक्टर पर टारगेट का प्रेशर डाला जाता है। इतनी सर्जरी, इतने टेस्ट, इतनी ओपीडी करो, तब इतने पैसे मिलेंगे। बहरहाल, स्थिति कैसे सुधरे, यह भी देखने वाली बात हैं :

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Covid-19 in gujarat

06.08.2022

प्रदेश में शुक्रवार को कोरोना के चलते तीन लोगों की मौत हो गई। इस संक्रमण के 847 नए मरीज भी सामने आए हैं। एक्टिव मरीजो में से 22 वेंटिलेटर पर हैं।राज्य में शुक्रवार को पूरे हुए 24 घंटे में अहमदाबाद, गांधीनगर एवं मोरबी जिले में एक-एक मरीज ने दम तोड़ दिया। इसके साथ ही अब तक कोरोना संक्रमण के चलते 10975 लोगों की जान चली गई। हाल में कुल एक्टिव केस 5992 हैं, इनमें से 22 की हालत गंभीर होने पर वेंटिलेटर पर हैं।सबसे अधिक 315 नए मामले अहमदाबाद जिले के (शहर के 305) हैं। वडोदरा जिले में 140 में से 106 शहर के हैं। मेहसाणा जिले में 98, राजकोट में 83, सूरत में 66, गांधीनगर एवं कच्छ में 32-32, अमरेली में 31, बनासकांठा में 19, भरुच एवं नवसारी में 15-15, भावनगर जिले में 14, जामनगर में 13, साबरकांठा में 12, वलसाड में 11, पोरबंदर में 10, आणंद में आठ, सुरेन्द्रनगर में सात, अरवल्ली एवं मोरबी में छह-छह, पाटण में पांच, खेड़ा, महिसागर एवं तापी में चार-चार, गिरसोमनाथ, जूनागढ़ एवं पंचमहाल जिले में दो-दो मरीज हैं। चौबसी घंटे में प्रदेश में 1198 मरीज कोरोना से मुक्त हुए हैं।

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Corona in jabalpur city

कोरोना से मौत का आंकड़ा जबलपुर जिले में लगातार बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को जारी की गई रिपोर्ट में रांझी निवासी 72 वर्षीय वृद्धा की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई। वृद्धा का इलाज निजी अस्पताल में चल रहा था। जिनका अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत आज किया जाएगा। वहीं बुधवार को जारी रिपोर्ट में भी एक वृद्ध की मौत हुई थी। लगातार दूसरे दिन भी मौत के बाद जिले में हड़कंप मच गया है।कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों की संख्या अब 806 पर पहुंच गई है। गुरुवार को कोविड से संक्रमित 20 नए मरीज सामने आए हैं। जबकि 36 मरीजों को आइसोलेशन से छुट्टी दे दी गई। जिसके बाद अब जिले में एक्टिव केसों की संख्या 192 हो गई है।

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