Depression distrub the doctors

मध्यप्रदेश में आठ दिन में दो डॉक्टर अपनी जान दे चुके हैं। दोनों में कारण डिप्रेशन है। एक्सपर्ट का मानना है कि कोविड के बाद से डॉक्टर डिप्रेशन में हैं। मेडिकल कॉलेजों में काउंसलर्स रखने की जरूरत है, जिससे मेडिकल स्टूडेंट्स और डॉक्टरों को तनाव से राहत मिल सके। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 80% डॉक्टर मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।भोपाल AIIMS में MBBS की सेकंड ईयर की स्टूडेंट मारिया मथाई ने रविवार को हॉस्टल की तीसरी मंजिल से कूदकर जान दे दी। वह केरल की रहने वाली थी और टॉपर थी। उसे स्कॉलरशिप भी मिली थी। मारिया के पिता ने बताया कि वह पिछले 2 महीनों से पढ़ाई को लेकर परेशान थी। पुलिस ने भी शुरुआती जांच में मौत की वजह डिप्रेशन बताई है।

इंदौर में मेडिकल स्टूडेंट ने लगाई फांसी

आठ दिन पहले इंदौर के एमवाय अस्पताल की जूनियर डॉक्टर अपूर्वा गुलानी ने सुसाइड कर लिया था। वह 3 साल से मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप कर रही थी। मौके से सुसाइड नोट भी मिला। इसमें जिंदगी से हारने की बात लिखी है। दोस्तों के मुताबिक वह कई दिन से डिप्रेशन में थी। वह मूल रूप से जबलपुर के नजदीक लखनादौन (सिवनी) की रहने वाली थी। माना जा रहा है कि उसने एनेस्थीसिया का ओवरडोज लिया था।

देशभर में डिप्रेशन में हैं 80% डॉक्टर्स

IMA (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 80% डॉक्टर्स ज्यादा काम की वजह से डिप्रेशन में हैं या मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। 56% डॉक्टर्स को 7 घंटे की नींद भी नसीब नहीं होती। ऐसे में डॉक्टर्स और मेडिकल स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ पर खतरनाक असर पड़ रहा है।नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने मेडिकल स्टूडेंट्स, रेसीडेंट्स और डॉक्टर्स पर रिसर्च की। इसके मुताबिक पिछले 10 साल में (2010-2019) तक 358 डॉक्टर्स ने सुसाइड किया है। इनमें 125 मेडिकल स्टूडेंट्स हैं, जबकि 105 रेसिडेंट डॉक्टर्स और 128 डॉक्टर्स ने मौत को गले लगाया है। ये रिपोर्ट हाल में जारी की गई है। रिसर्च में ये भी सामने आया कि 10 में से 7 सुसाइड केस ऐसे थे, जिनमें सुसाइड करने वाले डॉक्टर्स की उम्र 30 से कम थी।

एक्सपर्ट व्यू… खुलकर बातचीत करने से मिलेगा हल: डॉ. शोभना

BHU के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर और यूनिवर्सिटी स्ट्रेस मैनेजमेंट सेल में काउंसलर डॉ. शोभना ने डिप्रेशन को गंभीर समस्या बताया। उन्होंने बताया कि घर से लेकर स्कूल, कॉलेज और ऑफिस सभी जगह इसका असर देखने को मिल रहा है। खासकर युवाओं में डिप्रेशन सबसे ज्यादा हावी है। कई बार लगातार निगेटिव कमेंट्स या स्ट्रेस के कारण पर्सनालिटी प्रीडिस्पोजिशन होता है। इसका मतलब ये है कि जरा सी परेशानी उनमें एंग्जायटी ट्रिगर कर सकती है, जो सुसाइड का कारण बन सकती है।समाधान का जिक्र करते हुए डॉ. शोभना ने बताया कि मेडिकल फैकल्टी और स्टूडेंट्स के लिए हर सेक्शन में मेडिकल काउंसलर्स का होना जरूरी है, ताकि टीचर्स और स्टूडेंट्स परेशानी को खुलकर साझा कर सकें। डिजिटल युग में पेरेंट्स और बच्चों के बीच बातचीत जरूरी है।

योग और मोटिवेशनल सेशन पर जोर

भोपाल AIIMS के पीआरओ मयंक कपूर ने बताया कि स्टूडेंट्स की मेंटल हेल्थ को ध्यान में रखते हुए योग और मेडिटेशन प्रोग्राम किए जा रहे हैं। इसके अलावा, मोटिवेशनल सेशन पर भी फोकस किया जा रहा है। साथ ही, जीनोम सीक्वेंसिंग की मदद से डिप्रेशन और इसके समाधान पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह प्रोग्राम सभी लोगों के लिए होगा। इससे हर वर्ग को भी फायदा होगा। हाल में AIIMS भोपाल को नेशनल हेल्थ मिशन और हेल्थ डिपार्टमेंट के साथ मिलकर डिप्रेशन पर जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए फंडिंग की गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे मरीज को दवाइयों, काउंसलिंग के साथ स्पेसिफिक इलाज देने में मदद मिलेगी।

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Double workload on doctors in Surat’civil hospital

25.07.2022
सिविल अस्पातल के पीडियाट्रिक विभाग में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की संख्या में इजाफा नहीं हो रहा है। इससे डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ पर काम का बोझ बढ़ रहा है। पीडियाट्रिक विभाग में हर महीने 250 से 300 बच्चे भर्ती हो रहे हैं। वहीं इलाज के लिए 12 डॉक्टर ही हैं। इसी तरह मात्र 7 नर्सिंग स्टाफ हैं।पीडियाट्रिक विभाग के प्रमुख का कहना है कि 12 रेजिडेंट डॉक्टर और 7 से 8 नर्सिंग स्टाफ से ही काम चलाया जा रहा है। रेजिडेंट डॉक्टरों पर काम का दोगुना बोझ आ गया है। मौजूदा डॉक्टरों को 7 जगहों पर मरीजों को देखना पड़ रहा है। इस समय पीडियाट्रिक विभाग के वार्ड और आईसीयू को 50 से 60 बच्चे भर्ती हैं। ओपीडी में भी रोज 5 से 6 बच्चे इलाज के लिए आ रहे हैं।विभाग में 12 रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी बताई जा रही है। अगले साल नया एडमिशन होगा तो रेजिडेंट डॉक्टर आ जाएंगे। नर्सिंग स्टाफ की भर्ती की कोशिश की जा रही है। मात्र 7 नर्सिंग स्टाफ हैं। अभी 7 से 8 और नर्सिंग स्टाफ की जरूरत है।

पीडियाट्रिक विभाग में अभी 7 से 8 और नर्सिंग स्टाफ की है जरूरत

डॉक्टर संगीता प्रजापति ने बताया कि डॉक्टरों को एनआईसीयू, कोरोना बिल्डिंग, ट्रॉमा सेंटर, पीआईसीयू, ओपीडी और अन्य 2 वार्ड में ड्यूटी करनी पड़ रही है। मौजूदा 12 डॉक्टरों को राउंड द क्लॉक मरीजों का इलाज करने इन सातों विभाग में राउंड लगाना पड़ता है। इससे उन्हें परेशानी उठानी पड़ रही है। इसके साथ ही नर्सिंग स्टाफ की भी कमी है। हर 3 से 4 बच्चे पर 1 नर्सिंग स्टाफ होना चाहिए, पर 7 ही हैं। अभी 7 से 8 और नर्सिंग स्टाफ की जरूरत है।

पीडियाट्रिक विभाग के डॉक्टरों को 7 विभागों में इलाज के लिए आना-जाना पड़ता है
पीडियाट्रिक विभाग में अब भी 12 रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी है। कोरोना से एडमिशन रुक गया था। एक बैच नहीं आ पाया। इससे सिविल के पीडियाट्रिक विभाग में डॉक्टर की कमी हो गई है। डॉक्टरों पर दोगुना बोझ पड़ रहा है। -डॉ. संगीता प्रजापति, प्रमुख, पीडियाट्रिक विभाग

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