Doctors gave a new life to patient

10.08.2022

27 साल की उम्र ही क्या होती है। अगर फैक्ट्री में काम करने वाले वर्कर का हाथ बुरी तरह से कुचल उठे तो सोचिए, वो मंजर कैसा रहा होगा। घटना नवंबर 2019 की है। सुबह के 5 बज रहे थे और यूपी के सहारनपुर के रहने वाले जख्मी युवक को अस्पताल में भर्ती किया जाता है। उसका बायां हाथ (फोरआर्म) हाइड्रोलिक प्रेशिंग मशीन से पूरी तरह से क्रश हो गया था। फोरआर्म का मतलब अग्रभुजा यानी हाथ की कोहनी से आगे का हिस्सा पूरी तरह से जख्मी था। पूरे तीन साल तक कई स्तर की सर्जरी करने वाले एम्स दिल्ली (Aiims Delhi) के डॉक्टरों ने आखिरकार कमाल कर दिया। उस मरीज के लिए यह चमत्कार से कम नहीं है। इसके साथ ही एम्स देश का पहला अस्पताल बन गया, जहां एक मरीज के लिए सफलतापूर्वक नया फोरआर्म ही तैयार कर दिया गया।

बस एक राहत की बात थी
डॉक्टर बताते हैं कि उस दिन जब फैक्ट्री वर्कर अस्पताल आया था तो कोहनी के जोड़ से चोट 5 सेमी दूर तक थी। कलाई की तरफ स्किन, सॉफ्ट टिशूज, नर्व्स, मशल्स और हड्डी चोटिल हुई थी, बाकी हाथ को उतना नुकसान नहीं पहुंचा था। फैक्ट्री में बड़ी-बड़ी मशीनों को हैंडल करने में हाथ का ही इस्तेमाल होता है और ऐसे में काफी जोखिम होता है। इस केस में डॉक्टरों ने तीन स्टेज में आगे बढ़ने का फैसला किया। राहत की बात यह थी कि युवक की हथेली अब भी सामान्य स्थिति में थी और अपना फंक्शन कर रही थी।

डॉक्टरों ने बनाया प्लान
डॉ. मनीष सिंघल की अगुआई वाली प्लास्टिक सर्जरी की टीम ने मरीज की स्थिति का गंभीरता से आकलन किया। साफ हो चुका था कि यह बहुत ही जटिल केस है। हाथ जख्मी नहीं है और आगे के हिस्से यानी फोरआर्म में काफी चोट है जिससे अलग तरह की समस्या पैदा हो जाती है और ऐसे केस में हाथ का रीअटैचमेंट संभव नहीं होगा क्योंकि आगे का हाथ तो बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था।

6 घंटे का टाइम कीमती होता है
प्लास्टिक, पुनर्निर्माण और बर्न सर्जरी डिपार्टमेंट के प्रमुख सिंघल ने कहा, ‘ऐसे मामलों में सर्जरी तभी संभव हो पाती है जब मरीज को दुर्घटना के 6 घंटे के भीतर अस्पताल लाया गया हो। किस्मत से, इस मरीज को इस समय के भीतर लाया गया था।’इस केस में आमतौर पर दो विकल्प बनते थे, मरीज को प्रोस्थेटिक हाथ दिया जाए या हाथ के क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाकर फंक्शन कर रही हथेली को हाथ से अटैच किया जाए। लेकिन बाद वाले विकल्प में हाथ की लंबाई घट सकती थी। ऐसे में डॉक्टरों की टीम ने फोरआर्म को फिर से बनाने का फैसला किया और उसके साथ हथेली को जोड़ा जाना था।

पहला स्टेप
चोटिल हाथ से हथेली को जल्द से जल्द अलग करना था और क्रश हो चुके हिस्से को अलग। ऐसे में कोहनी की चोट की फिर से सिलाई की गई।

दूसरा स्टेप
अब हथेली को शरीर के दूसरे हिस्से से अटैच करना था। डॉक्टरों ने टखने के करीब बाएं पैर से इसे अटैच कर दिया। देखने और समझने में यह अजीब बात थी लेकिन डॉक्टरों के ऐसा करने के पीछे वजह चिकित्सकीय थी।

प्लास्टिक और बर्न्स सर्जरी विभाग के डॉ. राजा तिवारी ने बताया कि हम हथेली की संवेदनशीलता को बरकरार रखना चाहते थे इसीलिए इसे पैर से जोड़ा गया। अगर इसे शरीर के किसी दूसरे हिस्से से जोड़ा गया होता तो सेंसेशन खत्म हो सकता था। जब हाथ को वापस अपनी जगह लाया गया तो हमने बाएं पैर की उसी नर्व्स को भी लिया था। यही नहीं, हथेली को अस्थायी तरीके से अटैच करने के लिए पैर की हड्डियों का पता लगाना आसान था। डॉ. तिवारी ने कहा कि हमने पैर को चुना क्योंकि उसमें अतिरिक्त नसें, रक्त वाहिकाएं और मांसपेशियां होती हैं।

आगे की चुनौती
अब नया फोरआर्म बनाने के लिए डॉक्टरों ने पैरों से दो टिशू यूनिट निकाला। पहला हिस्सा घुटने के नीचे वाले हिस्से से लिया गया और दूसरा जांघ के पास से निकाला गया। आखिर में पैर में लगाई गई हथेली को अलग कर नए फोरआर्म के आगे जोड़ना था जिससे तंत्रिका तंत्र की मरम्मत या कहिए ऑपरेशन पूरा होता।सर्जरी टीम में शामिल डॉ. शिवांगी साहा ने बताया कि धमनियां, नसें और मांसपेशी को हड्डी से जोड़ने वाले ऊतक होते हैं जो अंगुलियों को मांसपेशियों से कनेक्ट करते हैं। हाथों का मूवमेंट करने के लिहाज से कमांड और कंट्रोल करने में ब्रेन के लिए कोई समस्या नहीं थी। बस इतना जरूर है कि मांसपेशी की ताकत कम हो जाती है।आज की तारीख में मरीज चाबी का इस्तेमाल कर सकता है, कुछ उठा सकता है, पानी की बोतल ले सकता है और कोहनी की ताकत भी अच्छी है। वह अपने बाएं हाथ से बड़ी चीजें भी पकड़ सकता है। वह अपनी अंगुलियों और अंगूठे के बीच में पेन पकड़ सकता है और पास की मांसपेशियों की मदद से लिख सकता है।सिंघल ने बताया कि महामारी के दौरान फॉलोअप कर पाना एक और बड़ी चुनौती रहा। हमने लॉकडाउन के दौरान एक टेली-रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम भी किया। प्लास्टिक सर्जरी डिपार्टमेंट से डॉ. शशांक चौहान और डॉ. सुवशीष दाश और ऑर्थोपेडिक व एनेस्थीशिया विभागों से डॉ. समर्थ मित्तल और डॉ. सुलगना भी टीम में शामिल थे। फिजियोथेरेपी का भी एक बड़ा रोल था जिसे डॉ. मीसा ने लीड किया था।

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Great initiative by doctors

महाराष्ट्र में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों का एक ग्रुप गरीब परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) की तैयारी के लिए मुफ्त कोचिंग दे रहा है।आइए जानते हैं इस कोचिंग के बारे में। लिफ्ट फॉर अपलिफ्टमेंट (LFU) प्रोजेक्ट, जो साल 2015 में शुरू हुई थी, ने गरीब परिवारों के 100 से अधिक छात्रों को NEET, MBBS और अन्य कोर्सेज के लिए ऑल इंडिया प्री मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा पास करने में मदद की है।डॉ अतुल ढाकाने ने 10 से 15 मेडिकल छात्रों के साथ प्रोजेक्ट शुरू किया था। उन्होंने कहा, ” ये बात साल 20215 की है, जब मैं पुणे में BJ मेडिकल कॉलेज में MBBS के थर्ड ईयर में था, मैं अर्निंग और लर्निंग की स्किम के तहत एक कोचिंग क्लास में बायोलॉजी पढ़ाता था। वहां, मैंने महसूस किया कि भारी फीस के कारण, गरीब पृष्ठभूमि के छात्र और ग्रामीण, आदिवासी और सूखाग्रस्त क्षेत्रों से आने वाले लोग कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते हैं, ”उन्होंने कहा, “शुरुआत में, हमने ग्रामीण क्षेत्रों के उन छात्रों के बारे में पता किया जो मेडिकल शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे और पुणे नगर निगम द्वारा संचालित स्कूल की एक छोटी कक्षा में उन्हें मार्गदर्शन देना शुरू कर दिया।”
बता दें, 36 बैच के 6 छात्रों ने मेडिकल और इंजीनियरिंग कोर्सेज के लिए महाराष्ट्र सरकार के कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) को क्रैक किया। उनमें से कई छात्रों ने अच्छे कॉलेजों में दाखिला लिया। डॉ अतुल के अनुसार, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में टॉप NEET कोचिंग कक्षाएं 3 लाख रुपये तक लेती हैं। LFU मुफ्त कोचिंग प्रदान करता है। LFU कोचिंग के लिए हर साल 60 छात्र दाखिला लेते हैं। जुलाई 2022 में कम से कम 48 LFU के छात्रों ने नीट परीक्षा दी थी।पुणे के बाद, LFUमुंबई से 600 किमी से अधिक पूर्वी महाराष्ट्र के आदिवासी मेलघाट क्षेत्र में फैला, जहां एक और शिक्षण प्रोग्राम शुरू किया गया था, लेकिन उन्हें NEET 2019 में मेलघाट बैच से वांछित परिणाम नहीं मिला। डॉ अतुल ने कहा, “वहां का माहौल परीक्षा की तैयारी के लिए अनुकूल नहीं था। इसलिए हमने अगले साल छात्रों को पुणे में स्थानांतरित कर दिया, और 16 छात्रों ने NEET पास किया और उनमें से 8 छात्रों ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लिया ”साल 2020 NEET में, 46 LFU छात्रों में से, 26 परीक्षा में सफल रहे। उलगुलान (Ulgulan) पहल को अब मराठवाड़ा के उस्मानाबाद तक बढ़ा दिया गया है जहां आवास की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। साल 2016 से, हमने 250 छात्रों को कोचिंग प्रदान की है और उनमें से 130 डॉक्टर बन गए हैं, या बन रहे हैं। 130 में से 70 MBBS कोर्स में शामिल हुए जबकि शेष BAMS, BDS और BHMS जैसे कोर्स किए।गरीबी के अलावा, मेलघाट के छात्रों को एक भाषा का भी सामना करना पड़ता है। कोरकू (Korku tribe) जनजाति के कुछ छात्र अंग्रेजी की तो बात ही छोड़ दें, मराठी से भी परिचित नहीं हैं।डॉ संतोष चटे, जो वर्तमान में मुंबई के कूपर अस्पताल में अपनी इंटर्नशिप कर रहे हैं, उन्होंने LFU से NEET की कोचिंग ली थी। साल 2017 में उन्होंने NEET परीक्षा पास की थी। डॉ संतोष ने कहा, “मैंने डॉक्टर बनने का सपना देखा था। कक्षा 10वीं पूरी करने के बाद, मैं LFU में आया और NEET के लिए उनके प्रोग्राम में शामिल हो गया। यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों और वंचित वर्गों के मेडिकल उम्मीदवारों के लिए एक वरदान है,”

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Standard of health department

सदर अस्पताल समेत मुजफ्फरपुर जिले का एक भी सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य विभाग के स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है। यहां तक कायाकल्प योजना के तहत अनुशंसित मुरौल सीएचसी भी। जबकि, राज्यस्तरीय एसेसमेंट(मूल्यांकन) के लिए मुरौल सीएचसी को तैयार करने को लेकर बिल्डिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि पर लाखों रुपए खर्च किए गए। लेकिन, मुरौल सीएसची समेत जिले के किसी भी सीएचसी-पीएचसी में 24 घंटे जांच, ब्लड स्टोरेज यूनिट, बीपी जांच के लिए ऑपरेटर, वजन मशीन, प्राइवेसी, कॉर्डिएक मॉनिटर की सुविधा नहीं है।
शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सदर में भी 24 घंटे जांच की सुविधा नहीं है। पिछले वर्ष कायाकल्प योजना के तहत जिले से सदर अस्पताल के एमसीएच के एसेसमेंट की अनुशंसा की गई थी। लेकिन, सरकार की सूची से यह बाहर हाे गया। इस वर्ष मुराैल सीएचसी को कायाकल्प प्रमाणीकरण के लिए तैयार किया गया। इसके बाद सिविल सर्जन ने 12 मार्च काे राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी काे पत्र लिखकर कायाकल्प के तहत अस्पताल के एसेसमेंट की अनुशंसा की।वहीं, 27 मई काे डीएम प्रणव कुमार ने राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक काे पत्र लिखकर मुराैल पीएचसी का कायाकल्प याेजना के लिए एसेसमेंट कराने की अनुशंसा की। डीएम ने लिखा था कि तीन माह तक मुराैल पीएचसी काे मानक में लाने के लिए तैयार किया गया है। बावजूद इसके 26 जुलाई काे जब राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से कायाकल्प के तहत एसेंसमेंट कराने के लिए कार्यपालक निदेशक संजय कुमार सिंह ने जो सूची जारी की, उसमें मुजफ्फरपुर जिले का एक भी अस्पताल शामिल नहीं है।

इस बोर्ड के झांसे में न आएं : सिर्फ दिखावे के लिए हैं, सुविधाएं मयस्सर नहीं

केंद्रीय स्वास्थ्य कल्याण एवं परिवार मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में साफ-सफाई और संक्रमण रोकने के लिए किए गए प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए कायाकल्प योजना की शुरुआत की है। इसके तहत स्वच्छता, साफ-सफाई और संक्रमण नियंत्रण के उच्च मानकों को हासिल करने वाले जिला अस्पतालों, अनुमंडलीय अस्पतालों, सीएचसी, पीएचसी और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को उनके कार्यों के आधार पर पुरस्कार दिया जाता है। स्वास्थ्य सचिव या मिशन डायरेक्टर स्तर की कमेटी अस्पताल में सुविधाओं का एसेसमेंट करती है। प्रथम स्थान अस्पताल को 50 लाख का पुरस्कार दिया जाता है।
कायाकल्प याेजना के लिए सदर अस्पताल के एमसीएच और मुराैल सीएचसी काे तैयार किया गया है। इसके लिए तत्कालीन सिविल सर्जन और फिर डीएम की ओर से राज्यस्तरीय एसेसमेंट कराने के लिए अनुशंसा की गई थी। सरकार की जाे लिस्ट नहीं है, उसे अभी तक देखा नहीं है। अब फिर से दाेनाें अस्पतालाें में जाे भी मानक में कमियां हाेंगी, उसे पूरा कर एसेसमेंट के लिए अनुशंसा की जाएगी।
-डाॅ. यूसी शर्मा, सिविल सर्जन।

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