04.06.2022
दिल्ली पुलिस ने हौज खास इलाके में एक किडनी रैकेट गिरोह का भंडाफोड़ किया है और शहर के विभिन्न हिस्सों से कम से कम 10 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार किए गए लोगों में एक ओटी टेक्निशियन व एक हेल्पर है।
26 मई को, पुलिस को एक अवैध किडनी प्रत्यारोपण रैकेट के बारे में गुप्त सूचना मिली, जिसने गरीब लोगों को निशाना बनाया और उन्हें अपनी किडनी बेचने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इसे और भी ऊंचे दामों पर बेच दिया।इसकी सूचना पर टीम गठित कर हौज खास इलाके में जाल बिछाया गया।
Vicious Santosh Gupta, who cheated 22 thousand in the name of treatment of a cancer patient in Bhopal, was caught by the police.
03.06.2022
समय-समय पर शातिर चोर पैसे ठगने के नए-नए तरीके अपनाते हैं। ऐसा ही मामला भोपाल में देखा गया, यहां पर कैंसर पीड़ित बच्ची के इलाज के नाम पर सोशल मीडिया का सहारा लेकर 22 हजार ठगने का मामला आया है, लोगों को इसी तरह से फंसाने वाले एक 12वीं फेल साइबर ठग को भोपाल पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पेशे से कबाड़ी यह ठग IPS सचिन अतुलकर के नाम से झूठी आईडी बनाकर मदद मांग रहा था। इस मामले में पुलिस को शिकायत मिली थी। वह इसी तरह कई लोगों काे ठग चुका है।
Two prisoners brought for treatment at Delhi’s LNJP Hospital absconding
01.06.202
अस्पताल में तब दहशत का माहौल बन गया जब पुलिस द्वारा इलाज के लिए लाए गए दो कैदी पुलिस व डॉक्टरों को चकमा देकर भाग गए।
पुलिस की यह कैसी बर्बरता, पोस्टमॉर्टम में लापरवाही
30.5.2022
दूदू पुलिस की लापरवाही की वजह से मेडिकल बोर्ड पर भी सवाल खड़े हो गए हैं, मामला 28.5.2022 दूदू का है जब तीन सगी बहनें दो बच्चों के साथ कुएं में कूद गई और अपनी जिंदगी समाप्त कर ली, जिस पर पुलिस ने पांचों शवों का पोस्टमॉर्टम करवाया जिसमें दो दंपतियों के प्रेगनेंट होने की पुष्टि हुई, फिर शवों को परिजनों को सुपुर्द कर दिया।
मामला आज गरमाया जब ग्रामीणों द्वारा कुएं में नवजात का शव तैरता हुआ दिखाई दिया, इससे पुलिस की लापरवाही साफ देखने को मिली और मेडिकल बोर्ड की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो उठे। माना जा रहा है कि यह नवजात शव उन्हीं दंपत्ति में से एक का है जिसकी डिलीवरी का समय डॉक्टरों द्वारा 2 दिन बाद बताया गया था। अप पुलिस द्वारा इस नवजात सबका भी पोस्टमॉर्टम करवाकर डीएनए का पता लगाया जाएगा और पुष्टि की जाएगी कि यह यह शव उन्हीं में से एक दंपति का है।
जैसलमेर के सबसे बड़े जवाहर अस्पताल की हालत बद से बदतर
30.5.2022
जिले के सबसे बड़े अस्पताल की ऐसी हालत दुर्भाग्यपूर्ण है, मोर्चरी में पोस्टमॉर्टम के सिस्टम और बयां करती तस्वीरें यह साबित करती है कि सरकारी अस्पतालों को इतना फंड मिलने के बावजूद उनमें मरीजों को दी जाने वाली सेवाएं दुरुस्त करने की काफी जरूरत है।
जैसलमेर के सबसे बड़े अस्पताल की व्यवस्था देखने लायक नहीं है क्योंकि यहां पर मरीजों की पर्याप्त देखरेख व इलाज के लिए अत्याधुनिक मशीनों की कमी है जिसके अंतर्गत बड़ी-बड़ी समस्याओं से जूझते हुए मरीजों का इलाज होना असंभव है। इससे बुरे हाल यहां की मोर्चरी के हैं जहां शवों को रखा जाता है,मोर्चरी में से आती दुर्गंध यह बताती है कि मोर्चरी में ना ही कोई डीप फ्रीज है और ना ही कोई सुविधा , जिसमें शवों को रखा जाता है, वही पोस्टमॉर्टम करने के लिए ना कोई अत्याधुनिक औजार है बल्कि पुराने तौर-तरीकों व पोस्टमॉर्टम करते वक्त खोपड़ी तोड़ने के लिए छेनी का इस्तेमाल करना पड़ता है। सरकार द्वारा समय-समय पर सरकारी अस्पतालों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं परंतु हालत अभी भी देखने योग्य नहीं है, इससे ना केवल डॉक्टरों बल्कि मरीजों के परिजनों का भी मनोबल व धैर्य टूटता है और सरकारी अस्पतालों की ओर विश्वास कम होता है।
अब चिकित्साकर्मियों पर बेबुनियादी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकेगी पुलिस
ऐसे मामले जिनमें डॉक्टरों की कोई गलती ना हो और पेशेंट के परिजनों के द्वारा पुलिस में बेबुनियादी एफआईआर दर्ज कराई गई हो,यह मामले अब एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर)के अंतर्गत सुलझाए जाएंगे।
30.5.2022
जयपुर| हाल ही में हुए दोसा के लालसोट में डॉक्टर की आत्महत्या के मामले में संज्ञान लेते लेते हुए राजस्थान सरकार द्वारा एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम) लागू हुआ है, जिसमें चिकित्सक व मेडिकल कर्मियों के खिलाफ तब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी जब तक मेडिकल बोर्ड की कमेटी की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हो जाती। हाल ही में ऐसे कई मामले देखे गए हैं जिनमें पेशेंट के परिजन आधी अधूरी जानकारी के आधार पर ही डायरेक्ट ऑनलाइन माध्यम से डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा देते थे, जिस पर पुलिस द्वारा जांच पड़ताल किए बिना तुरंत एक्शन लिए जाते थे। ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सक व चिकित्साकर्मियों को मानसिक रूप से उत्पीड़न होना पड़ता है, जिससे उनकी कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सड़क दुर्घटना में घायलों की मदद करने वालों को सरकार देगी इनाम
सड़क दुर्घटना पीड़ितों की जान बचाने में दुर्घटना के समय वहां उपस्थित व्यक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, अगर वे समय पर पीड़ित को अस्पताल पहुंचा दें तो उसकी जान बचने के आसार बढ़ जाते हैं, एवं नुकसान भी कम होता है | लेकिन भूतकाल में सहायता करने वालों से ही उलटे सवाल किये जाने लगे, क़ानूनी प्रक्रिया में उलझाया जाने लगा तो लोग आपातकाल में सहायता देने से कतराने लगे |
इसके बचाव हेतु सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार ने दुर्घटना पीड़ितों कि मदद करने वाले नेक आदमियों (Good Samaritan) को प्रोत्साहित करने के लिए उनसे अस्पताल प्रशासन और पुलिस द्वारा अनावश्यक सवाल पूछे जाने से रोकने कि व्यवस्था की है, मदद करने वाले को पुलिस के लफड़ों में नहीं उलझना पड़ेगा, ना ही कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे |
साथ ही अस्पताल प्रशासन की तरफ से उस नेक बन्दे को “गुड सेमेरिटन प्रोत्साहन पत्र” एक सर्टिफिकेट के रूप में जारी किया जायेगा |

इसके साथ ही कई अन्य अच्छी व्यवस्थाएं भी की हैं जिनकी जानकारी संलग्न है –
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FIR Number is must for MLC
प्रिय सरकारी चिकित्सक साथियों 🙂
चिकित्सकों को जिस क्षेत्र में सबसे ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है वह है मेडिको लीगल कार्य, क्यूंकि इसमें एक छोटी सी गलती या लापरवाही आप पर भारी पड़ सकती है !
तो कैसे बचा जाए ? हमेशा तथ्यों का गंभीरता से अवलोकन करें तथा मशविरे (अगर आवश्यक हो) के बाद ही अंतिम राय दें !
एक खतरनाक स्थिति के बारे में जानिए ताकि आप भविष्य में परेशानी में ना फसें –
अक्सर पुलिस आपके सामने एक तहरीर प्रस्तुत करती है जिसमें ना कोई डिस्पेच नम्बर होता है और ना ही कोई मुकदमा संख्या, समझदार और मंझे हुए साथी तो हमेशा से डिस्पेच नंबर के साथ ही तहरीर लेते हैं अथवा फोन करवाकर पुलिस वाले से थाने से डिस्पेच नंबर मंगवाते हैं लेकिन नए साथी जानकारी के अभाव में या खाकी के प्रभाव में आकर कई बार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं और बिना किसी क्रमांक के ही एमएलसी रिपोर्ट जारी कर देते हैं, इसके लिए कई बार डॉक्टर जजों से डांट खाते हैं और माफ़ी मांगते हैं… क्यूँ ? किसके लिए ? अपनी जान जोखिम में ?
23 जनवरी 2018 के आदेश में (पूर्व में भी) निदेशक जन स्वास्थ्य ने स्पष्ट किया है की कोई भी तहरीर अगर “मुकदमा नंबर मय धारा” के प्रस्तुत की जाती है तो केवल उसी स्थिति मे एमएलसी रिपोर्ट जारी की जानी है और बनाई गयी रिपोर्ट्स की मासिक सुचना निदेशक को भिजवाई जानी है जिसमें “मुकदमा नंबर मय धारा” का उल्लेख अलग से करना है !
साथियों भविष्य में कोई भी साथी यह गलती ना दोहरावे.. बिना “मुकदमा नंबर मय धारा” के कोई भी एमएलसी रिपोर्ट ना जारी की जाए ! डिस्पेच नंबर अथवा (डिस्पेच नंबर + एफ़आइआर नंबर) होने पर ही कोई मेडिकोलीगल कार्य शुरू करें, बिना नम्बरी अथवा दस्ती लिखी तहरीर को स्वीकार ना करें !
वरना फंसने पर ही पता लगेगा की यह मामूली गलती नहीं बल्कि बहुत बड़ा झोल है !
सावधान रहें.. सुरक्षित रहें..

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Driving license guideline forms and medical certificate
वाहन चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता होती है और लाइसेंस बनाने के लिए आपका मेडिकली फिट होना आवश्यक है |
मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट चिकित्सक द्वारा बनाया जाता है जिसकी जानकारी संलग्न है –
Basic facts of medico legal case
Most important duty– The first and foremost duty of the treating doctor is to save the life of a patient and give necessary urgent treatment. Police should be informed as early as possible but the patient should not be allowed to suffer. For this he must not wait for the arrival of police.
Whenever a suspected medico legal case is brought in the emergency, it shall be the duty of the Medical Officer on duty to send information to the police station. Acknowledgement from the police officer receiving the information will be kept in the file of the patient and in other OPD cases it shall be pasted in the OPD register or with the Medical Officer for further reference.
The Medical Officer will make a note in the file of the patient as to the time and date of informing the police. He will then make a complete record of all injuries and also note the date and time of admission of the case therein. Name and addresses of the attendants who brought the patient should also be recorded in the file and admission O.P.D. register if possible.
The Medical Officer will also mark with red pen on the top of first page of the file of the patient the letters “M.L.C.”
Always take the consent of the injured person on the MLR Form. If the patient is less than 12 years, take the consent of the guardian/accompanying person and get his signature/thumb impression. If an unconscious/ semiconscious patient is brought in emergency along with family/guardian, the consent shall be taken from them. In case of refusal by the family/guardian the medical officer shall mention on the MLR that the consent could not be recorded. (Write brief reasons).
The preliminary entries like name of the hospital/institute, MLR No., with date, name of the doctor with full designation and place of posting, exact date and time of examination, name of the injured with complete address age/sex, caste/occupation, name of the accompanied person and relation with the injured, name and number of the constable/HC with police post/police station and district must be entered before the examination of the injured is started. If admitted, write the C.R. No. with date and name of the ward.
Identification marks – Two identification marks preferably on the exposed parts of the body be recorded for comparing the same for identification in the court while giving the evidence.
Brief history of the incident be recorded as stated by the injured/ accompanying person regarding time, manner (accidental/ intentional) with weapon/ means caused and place of event of injury/poisoning, and the time sequence of symptoms/ incapacitation developed etc.
General condition of the person like pulse, BP, respiration, temperature, pupils, level of consciousness, posture, gait, speech, bleeding through natural orifices like ear, nose, mouth, rectum, vagina, etc., paralysis, urinary/faecal retention/incontinence, smell etc. be recorded. The condition of the clothes be recorded regarding their disorder, buttons(intact, undone, or torn), rents, tears, cuts whether coinciding with a particular injury, presence of stains like blood, mud/sand, weeds, faecal, seminal etc., foreign matter, stippling, burns etc.