Low cost technology of treatment

29.07.2022

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) रायपुर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) भिलाई मिलकर इलाज की प्रभावी और कम लागत तकनीक विकसित करेंगे। इसके साथ ही IIT में नेत्र रोगियों और MRI के लिए विकसित की गई नई तकनीक को भी ट्रायल के लिए एम्स को प्रदान किया जाएगा। दोनों ने मिलकर अनुसंधान के लिए नए अवसर तलाशने के लिए MOU पर हस्ताक्षर किए हैं।एम्स के निदेशक डॉ. नितिन एम. नागरकर और IIT भिलाई के निदेशक प्रो. रजत मूना ने इस करार पर हस्ताक्षर किए हैं। बताया गया कि IIT ने नेत्र रोगियों और एमआरआई की लागत कम करने के लिए लगातार शोध के बाद नई तकनीक और उपकरणों का विकास किया है। इसे ट्रायल के लिए एम्स को हस्तांरित किया जा सकता है।प्रो. नागरकर का कहना था कि दोनों संस्थानों के शिक्षक मिलकर संयुक्त अनुसंधान प्रारंभ कर सकते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में सदैव नई तकनीक की जरूरत रहती है जिसे IIT के इंजीनियर पूरा कर सकते हैं। इसी दिशा में यह कदम उठाया गया है।IIT के निदेशक प्रो. रजत मूना ने बताया कि IIT में 10 से अधिक स्टार्टअप हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपनी तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान की है। इनमें नेत्रों की ज्योति को परखने के लिए एक नई मशीन भी बनाई गई है जो काफी कम लागत पर जांच कर सकती है। एमआरआई की लागत कम करने के लिए भी शोध किया गया है जिसका लाभ सभी वर्ग को मिल सकेगा।इस अवसर पर IIT भिलाई ने मेडिकल छात्रों के लिए नई तकनीक पर एक कोर्स भी शुरू करने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा संस्थान और तकनीकी संस्थान के मध्य यह अपने तरह का पहला MOU है जो प्रदेश के लिए नई राह खोल सकता है।

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New research in iit guwahati for divyang

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रोस्थेटिक लेग को इस तरह से तैयार किया गया है, ताकि दिव्यांग इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल भी आराम से कर सकें। इस प्रोस्थेटिक लेग को लगाने के बाद दिव्यांग को टॉयलेट पर बैठते समय लेग को हटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।शोधकर्ताओं का कहना है, ऐसे प्रोस्थेटिक लेग का इस्तेमाल करते समय यह देखना जरूरी होता है कि इससे मरीज को कितना सपोर्ट मिल पा रहा है। हमने जो प्रोस्थेटिक लेग तैयार किया है वो 100 किलो तक के मरीज का भार उठाने में सक्षम है। फिजिकल एक्टिविटी के दौरान सबसे जरूरी बात होती है मरीज के बैलेंस को बनाए रखना और उसे गिरने से रोकना। इस नए प्रोस्थेटिक लगे में इस बात का ध्यान रखा गया है। यह हार्ड जगह पर भी दौड़ते या चलने समय बॉडी को बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है। इसका ट्रायल भी हो चुका है।इंडियन इंस्टीटॺूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ऐसा प्रोस्थेटिक पैर तैयार किया है, जिसकी मदद से दिव्यांग अपनी सुविधा के मुताबिक बैठ सकेंगे। शोधकर्ताओं का कहना है, यह ऐसा प्रोस्थेटिक लेग है, जिसकी मदद से दिव्यांग पैरों से जुड़े वर्कआउट जैसे स्क्वाट्स, क्रॉस लेग और बैठकर किए जाने वाले योगासन भी कर सकेंगे। इससे चलने-फिरना आसान हो

कंफर्टेबल प्रोस्थेटिक
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रोस्थेटिक लेग को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दिव्यांग बिना किसी परेशानी से इसे यूज कर सकें। आमतौर पर प्रोस्थेटिक लेग के जरिए पैरों में चलने के अलावा दूसरी तरह के मूवमेंट में दिक्कत होती है।

दिव्यांग को बैठते समय इस प्रोस्थेटिक को हटाना नहीं पड़ेगा।
इसे ऐसे एडजस्ट किया जाता है

शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रोस्थेटिक जरूरतमंद की स्थिति के मुताबिक बदलता है। यह निर्भर करता है कि मरीज के पैर की लम्बाई कितनी है। उसकी उम्र कितनी है और स्थिति के मुताबिक कितनी स्टेबिलिटी चाहिए। जैसे- उम्रदराज बुजुर्गों के गिरने का खतरा रहता है, इसलिए उन्हें इसकी कितनी जरूरत है, इसकी बनावट उसके मुताबिक कितनी बदलेगी, इसे तैयार करते समय इन सभी बातों का खयाल रखा जाता है। इस तरह मरीज की जरूरत के हिसाब से इस लेग को तैयार किया जाता है।

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