Patna Medical College, Hospital (PMCH) lodged an FIR.

21.06.2022

पीएमसीएच में कोरोना काल के दौरान खरीदे गए सामान का ब्याेरा दर्ज हाेने वाला रजिस्टर गायब कर दिया गया है। खरीद-फरोख्त में हुई लाखों की धांधली को छिपाने के लिए ऐसा किया गया है। मामला सर्जिकल स्टोर का है। वित्तीय वर्ष 2020-2021 के दौरान सर्जिकल स्टोर ने जितनी भी खरीदारी की, उसका ब्योरा इसी एलपी (लोकल पर्चेज) बुक में रहता था। लोकल स्तर पर कॉटन, चादर, कंबल, पीपी किट, जांच किट सहित अन्य सर्जिकल आइटम की खरीद की जानकारी इसी एलपी बुक में दर्ज रहती है। क्रय में धांधली की आशंका को देखते हुए पीएमसीएच के अधीक्षक डाॅ. इंद्रशेखर ठाकुर ने पीरबहोर थाने में एफआईआर दर्ज कराई है। अधीक्षक ने पुलिस से अपने लिखित आवेदन में कहा है कि शल्य भंडार से वित्तीय वर्ष 2020-2021 का एक एलपी बुक (स्थानीय क्रय रजिस्टर )गायब है। उन्होंने लिखा है कि एलपी बुक एक महत्वपूर्ण अभिलेख है और इसका गायब होना एक गंभीर मामला है। एफआईआर में लिखा गया है कि तत्कालीन लिपिक सह भंडारपाल हेमंत कुमार ने वर्तमान भंडारपाल महेश प्रसाद शर्मा को शल्य भंडार का पूर्ण प्रभार नहीं सौंपा है। पुलिस ने मामले में छानबीन शुरू कर दी है। शल्य भंडार के वर्तमान लिपिक सह भंडारपाल महेश प्रसाद शर्मा से इस बाबत पुलिस ने पूछताछ भी है। उनसे इस संबंध में अतिरिक्त जानकारी और दस्तावेज मांगा गया है।

भंडार और पंजी की जांच में सामान में था अंतर

पीएमसीएच सूत्रों की मानें तो अगर मामले की जांच सही से जाए तो क्रय-विक्रय में धांधली की पोल खुल जाएगी। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है। दस्तावेज खंगाला जा रहा है। विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी। कुछ महीने पहले बीएम दास रोड में पीरबहोर थाने की पुलिस छापेमारी की थी। वहां से पीएमसीएच की एचआईवी किट बरामद की थी। जिस एलपी बुक के गायब होने की बात हो रही है, उसमें सर्जिकल सामान का ब्योरा रहता है। सूत्रों की मानें ताे सर्जिकल स्टोर की भंडार पंजी में जिस सामग्री को जितना दर्शाया गया है, वह वास्तव में भंडार में उतना नहीं है। सूत्रों ने बताया कि कुछ दिन पहले जांच हुई तब पता चला कि भंडार पंजी में 300 कंबल दिखाए गए हैं, जबकि भंडार में मात्र 18 पाए गए। वहीं भंडार पंजी में 200 छोटा ऑक्सीजन सिलेंडर और 500 बड़ा सिलेंडर दिखाया गया था जबकि स्टॉक में इससे ज्यादा मिला। एलपी बुक गायब होने से कई सामग्री का विवरण फिलहाल नहीं मिल रहा है।

पत्र में लिखा है-घोटाला उजागर होता इसलिए गायब किया गया

कुछ दिन पहले वर्तमान लिपिक सह भंडारपाल महेश प्रसाद शर्मा ने अधीक्षक को पांच पन्ने का पत्र लिखा था। उस पत्र में शल्य भंडार की अनियमितताओं को दर्शाया गया है। पत्र में साफ लिखा गया है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 का एलपी बुक तत्कालीन भंडारपाल और संबंधित कर्मियों का घोटाला उजागर होता इसलिए इसे जानबूझकर गायब किया गया है। महेश ने अपने पत्र में आशंका जताई कि उनके कक्ष से तत्कालीन भंडारपाल हेमंत कुमार और शिवेंद्र प्रसाद ने ही एलपी बुक गायब किया है। एलपी बुक में आपत्ति दर्शाने की बात भी कही गई है। पत्र में लिखा गया है कि भंडार पंजी और मौजूद सामग्रियों का मिलान करने पर बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। इसी कारण से शल्य भंडार के पांच सालों के भंडार पंजी के वितरण की जांच वरीय अधिकारियों से कराई जाए।

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Under the Drugs and Cosmetics Act 1940 in Patna, now FIR will not be registered in the police stations.

10.06.2022
एसएसपी डॉक्टर मानवजित सिंह ढिल्लों ने थानों को निर्देश जारी किया है की अब से ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के तहत एफआईआर अब थानों में दर्ज नहीं होगी। पुलिस मुख्यालय से राज्य के सभी एसएसपी और एसपी को इस संबंध में एक पत्र लिखा गया था। पुलिस मुख्यालय के द्वारा निर्गत पत्र के बाद एसएसपी ने यह आदेश जारी किया है। एसएसपी ने सभी थानेदारों को निर्देश दिया है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के अध्याय 3,4 और 4a के तहत जो भी मामले दर्ज हैं उसे 1 महीने के के भीतर ड्रग इंस्पेक्टर को सौंप दें। एसएसपी के पत्र में लिखा गया है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के अध्याय 3,4 और 4a में वर्णित अपराधियों में पुलिस के पास प्राथमिकी दर्ज करने की शक्ति नहीं है और ना ही पुलिस ऐसे मामलों में अनुसंधान नहीं कर सकती है। एसएसपी ने थानेदार को यह भी आदेश दिया है कि पहले से जिन थानों में ऐसे मामले दर्ज हैं और जिनका अनुसंधान चल रहा है वह संबंधित ड्रग इंस्पेक्टर को सौंप दें। एसएसपी के आदेश के बाद थानेदारों ने ऐसे मामलों का ट्रांसफर ड्रग विभाग में करना शुरू कर दिया है।

अब चिकित्साकर्मियों पर बेबुनियादी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकेगी पुलिस

ऐसे मामले जिनमें डॉक्टरों की कोई गलती ना हो और पेशेंट के परिजनों के द्वारा पुलिस में बेबुनियादी एफआईआर दर्ज कराई गई हो,यह मामले अब एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर)के अंतर्गत सुलझाए जाएंगे।

30.5.2022
जयपुर| हाल ही में हुए दोसा के लालसोट में डॉक्टर की आत्महत्या के मामले में संज्ञान लेते लेते हुए राजस्थान सरकार द्वारा एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम) लागू हुआ है, जिसमें चिकित्सक व मेडिकल कर्मियों के खिलाफ तब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी जब तक मेडिकल बोर्ड की कमेटी की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हो जाती। हाल ही में ऐसे कई मामले देखे गए हैं जिनमें पेशेंट के परिजन आधी अधूरी जानकारी के आधार पर ही डायरेक्ट ऑनलाइन माध्यम से डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा देते थे, जिस पर पुलिस द्वारा जांच पड़ताल किए बिना तुरंत एक्शन लिए जाते थे। ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सक व चिकित्साकर्मियों को मानसिक रूप से उत्पीड़न होना पड़ता है, जिससे उनकी कार्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

FIR Number is must for MLC

प्रिय सरकारी चिकित्सक साथियों 🙂
चिकित्सकों को जिस क्षेत्र में सबसे ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है वह है मेडिको लीगल कार्य, क्यूंकि इसमें एक छोटी सी गलती या लापरवाही आप पर भारी पड़ सकती है !
तो कैसे बचा जाए ? हमेशा तथ्यों का गंभीरता से अवलोकन करें तथा मशविरे (अगर आवश्यक हो) के बाद ही अंतिम राय दें !
एक खतरनाक स्थिति के बारे में जानिए ताकि आप भविष्य में परेशानी में ना फसें –

अक्सर पुलिस आपके सामने एक तहरीर प्रस्तुत करती है जिसमें ना कोई डिस्पेच नम्बर होता है और ना ही कोई मुकदमा संख्या, समझदार और मंझे हुए साथी तो हमेशा से डिस्पेच नंबर के साथ ही तहरीर लेते हैं अथवा फोन करवाकर पुलिस वाले से थाने से डिस्पेच नंबर मंगवाते हैं लेकिन नए साथी जानकारी के अभाव में या खाकी के प्रभाव में आकर कई बार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं और बिना किसी क्रमांक के ही एमएलसी रिपोर्ट जारी कर देते हैं, इसके लिए कई बार डॉक्टर जजों से डांट खाते हैं और माफ़ी मांगते हैं… क्यूँ ? किसके लिए ? अपनी जान जोखिम में ?

23 जनवरी 2018 के आदेश में (पूर्व में भी) निदेशक जन स्वास्थ्य ने स्पष्ट किया है की कोई भी तहरीर अगर “मुकदमा नंबर मय धारा” के प्रस्तुत की जाती है तो केवल उसी स्थिति मे एमएलसी रिपोर्ट जारी की जानी है और बनाई गयी रिपोर्ट्स की मासिक सुचना निदेशक को भिजवाई जानी है जिसमें “मुकदमा नंबर मय धारा” का उल्लेख अलग से करना है !

साथियों भविष्य में कोई भी साथी यह गलती ना दोहरावे.. बिना “मुकदमा नंबर मय धारा” के कोई भी एमएलसी रिपोर्ट ना जारी की जाए ! डिस्पेच नंबर अथवा (डिस्पेच नंबर + एफ़आइआर नंबर) होने पर ही कोई मेडिकोलीगल कार्य शुरू करें, बिना नम्बरी अथवा दस्ती लिखी तहरीर को स्वीकार ना करें !

वरना फंसने पर ही पता लगेगा की यह मामूली गलती नहीं बल्कि बहुत बड़ा झोल है !

सावधान रहें.. सुरक्षित रहें..

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